साबित तो करो!
जीनव की कठिन शर्तें। मैराथन। जीने और जीतने की अदम्य चाहत। इसे हासिल करने में जो मददगार हो सकता है, लोग तो उसे ही देखेंगे, उसे ही पूछेंगे। हालांकि, हम सब एक-दूजे के लिए उपयोगी हैं। लेकिन इसे दिखाना और साबित भी करना पड़ता है।और भीऔर भी
जीनव की कठिन शर्तें। मैराथन। जीने और जीतने की अदम्य चाहत। इसे हासिल करने में जो मददगार हो सकता है, लोग तो उसे ही देखेंगे, उसे ही पूछेंगे। हालांकि, हम सब एक-दूजे के लिए उपयोगी हैं। लेकिन इसे दिखाना और साबित भी करना पड़ता है।और भीऔर भी
एक तो मानव मस्तिस्क की संरचना, ऊपर से वर्तमान के खांचे में कसी सोच की धृतराष्ट्री जकड़। सो, वर्तमान की सार्थक आलोचना और भविष्य की तार्किक दृष्टि तक हम पहुंच ही नहीं पाते और आगे बढ़ने की कोशिश में हमेशा मुंह की खाते रहते हैं।और भीऔर भी
हम वर्तमान की जमीन पर खड़े होकर, उसी के फ्रेम में रहकर भविष्य का अनुमान लगाते हैं। भविष्य में यह फ्रेम खुद कैसे बदल जाएगा, इसका पता नहीं रहता। इसीलिए बड़े-बड़े विशेषज्ञों तक की भविष्यवाणियां बाद में हास्यास्पद साबित हो जाती हैं।और भीऔर भी
हालात जितने मुश्किल हों, हमारी मुस्कान उतनी ही बढ़ जानी चाहिए। अन्यथा हम मुश्किलों से सीख नहीं पाएंगे। हम दुखी नहीं, खुश रहने पर ही सीख पाते हैं। और, खुश रहना एक मानसिक अवस्था है जिसकी कुंजी हमेशा हमारे हाथ में रहती है।और भीऔर भी
ज़िंदगी का असली मूल्य महज गणनाओं में नहीं, बल्कि यह जानने व पता लगाने में है कि असली चीजें क्या हैं और कैसे काम करती हैं। दुनिया हमें धकेलती है हिसाब-किताब लगाने की तरफ। लेकिन असली चीजें हिसाब-किताब से बहुत परे होती हैं, बंधु!और भीऔर भी
जो लोग थोड़े समय में अपना निवेश वापस पा लेना चाहते हैं, वे अदूरदर्शिता के शिकार हैं। थोड़े समय में कोई भी विचार पूरा खिल नहीं पाता। हो सकता है कि कई साल तक उससे कुछ न निकले। लेकिन जब वह फलीभूत होगा तो अरबों की बारिश कर सकता है।और भीऔर भी
सही व काम की शिक्षा पर किया गया खर्च कभी बेकार नहीं जाता। वो तो निवेश की तरह है जिसमें अभी उठाई गई थोड़ी-सी तकलीफ बाद में बड़े आराम का आधार बन जाती है। इसलिए शिक्षा को कभी उपभोग नहीं, हमेशा निवेश मानना चाहिए।और भीऔर भी
मन व्यग्र व परेशान हो तो हमें उसे शांत, स्वस्थ, संतुलित व संतुष्ट रखने के लिए, यकीन मानिए, निजी तौर पर किसी मनोरंजन की जरूरत नही होती क्योंकि हमारे सपने न जाने कहां-कहां से नायाब छवियां निकालकर यह काम बखूबी कर डालते हैं।और भीऔर भी
असहाय आदमी का मन और आसरा न टूटे, इसलिए चलेगा भगवान। इस बेरहम व पत्थर दिल दुनिया में एक भगवान ही तो है जो सोते-जागते हर पल कमजोर का साथ देता है। इसलिए भगवान को केवल पत्थर की मूर्ति या अमूर्त सत्ता मानकर नहीं चला सकता।और भीऔर भी
देश के लिए सोचना आसान है, करना कठिन। सोचने के लिए बस भावना चाहिए, जबकि करने के लिए सही हालात का सच्चा ज्ञान जरूरी है। भावना में सच्चे, ज्ञान में कच्चे रहे तो सत्ता के लिए लार टपकाता कोई समूह हमारा इस्तेमाल कर लेता है।और भीऔर भी
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