विचित्र पैराडॉक्स है कि देश का जीडीपी 7.8% बढ़ रहा है। लेकिन मारुति सुज़ुकी का लाभ 26% गिरा। सिप्ला के शुद्ध लाभ में 35% की गिरावट। एसीसी का मुनाफा तो घटती बिक्री के बीच 92% डूब गया। यह सैम्पल अपवाद नहीं, हकीकत है। लेकिन फाइनेंस के दिग्गज़ अर्थव्यवस्था का यह सच गले से नीचे उतारने को तैयार नहीं। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी के सीआईओ शंकरन नरेन कहते हैं कि समस्या दुनिया में चल रहे युद्ध और कच्चे तेल के चढ़ते दाम में है। भारतीय शेयर बाज़ार का मूल्यांकन वाजिब स्तर पर आ चुका है। यह निवेश का सही अवसर है, एसआईपी जारी रखें। वैसे, फाइनेंस के दिग्गज अगर भारतीय अर्थव्यवस्था की हकीकत स्वीकार कर लेंगे तो भौकाल पर टिका उनका सारा धंधा बैठ जाएगा। लेकिन इस भौकाल में देश का आम निवेशक ऐसा फंसा है कि न निगल पा रहा है, न उगल पा रहा है। हर तरफ लालच का ऐसा विराट जाल है कि उसका बच पाना मुश्किल है। देश के 85.5% घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है। शेयर खरीदना-बेचना एप्प पर खटाखट। म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए पीसी या लैपटॉप की जरूरत नहीं। 2018-19 में म्यूचुअल फंड में एसआईपी से ₹92,700 करोड़ आए थे। 2025-26 में यह रकम ₹3.50 लाख करोड़ पर पहुंच गई। महीने में ₹100 भी बचे तो एसआईपी खटाक से खींच सकती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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