निजी स्वार्थ में डूबा आत्मविभोर व्यक्ति सत्ताशीर्ष पर बैठकर देश-दुनिया का कितना नुकसान कर सकता है, इसे पश्चिम एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया है। प्रधानंमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25-26 फरवरी को जेरूसलम जाकर फर्जी मेडल के चक्कर में ‘फादरलैंड’ कहकर इज़रायल को सिर न चढ़ाया होता तो शायद अमेरिका के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला करने की उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती। इस हमले के बाद ब्रेन्ट कच्चे तेल के दामऔरऔर भी

इधर मोदी का राजनीतिक विजय-रथ आसमान का रुख किए हुए है, उधर भारतीय रुपया रसातल में डूबता बराबर नई-नई तलहटी पकड़ता जा रहा है। आज एक डॉलर 95.91 रुपए और यूरो 112.27 रुपए पर जा पहुंचा। कमाल की बात यह है कि जनवरी 2025 से फरवरी 2026 तक जब रुपया खाक बनता जा रहा था, तब सरकारी और निजी अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि भारत ‘गोल्डीलॉक्स’ अवस्था से गुजर रहा है, जहां आगे सब अच्छा ही अच्छाऔरऔर भी

दुनिया में छिड़े युद्ध जैसे बाहरी कारक और देश के भीतर मुद्रास्फीति, चालू खाते व पूंजी खाते जैसे घरेलू कारक यकीनन रुपए के गिरने की वजह बनते हैं। लेकिन हमें इस बार रुपए के लगातार गिरते जाने की वजह को समझने के लिए दूसरे कारकों पर भी गौर करना होगा। ध्यान दें कि जनवरी से दिसंबर 2025 तक दुनिया की छह मुद्राओं की बास्केट के सापेक्ष डॉलर की शक्ति को नापनेवाला डॉलर सूचकांक 108.09 से गिरकर 98.25औरऔर भी

हमारा रुपया हाथ से निकल चुका है। अब इसे भारतीय रिजर्व बैंक का कोई हस्तक्षेप ज्यादा गिरने से नहीं रोक सकता। वैसे रिजर्व बैंक खुद कहता रहा है कि वो विदेशी मुद्रा बाज़ार में तभी हस्तक्षेप करता है, जब रुपया ज्यादा ही चपल व चंचल हो जाता है। वो इसकी इस वोलैटिलिटी को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा के स्पॉट और फॉरवर्ड बाज़ार, दोनों में डॉलर बेचता है। लेकिन न तो वो देश से विदेशी निवेशकों केऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में संस्थागत निवेशकों से लेकर व्यक्तिगत निवेशकों में बेचैनी छाई हुई है। इस साल 2026 में जनवरी से अप्रैल तक के चार महीनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने 1.92 लाख करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं। यह पूरे कैलेंडर वर्ष 2025 में उनकी कुल ₹1.66 लाख करोड़ की निकासी से भी ज्यादा है। भारतीय कंपनियों में एफपीआई की शेयरधारिता घटकर अभी 16.7% पर आ गई है। यह 2010 के बाद पिछले 16 सालोंऔरऔर भी