रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक हमारे बैंकों को एकाध दिन के लिए धन उपलब्ध कराता है, जबकि रिवर्स रेपो वह ब्याज दर है जो रिजर्व बैंक अपने पास बैंकों द्वारा रखे गए अतिरिक्त धन पर अदा करता है। जब सिस्टम में नकदी का प्रवाह ज्यादा रहता है तो रिजर्व बैंक ब्याज दर बढ़ाकर उसे घटाता है और जब कम रहता है तो ब्याज दर घटाकर उसे बढ़ाता है। माना जाता है किऔरऔर भी

इस समय दुनिया भर के शेयर बाज़ारों के लिए मुद्रास्फीति या महंगाई सबसे विकट समस्या बनी हुई है। अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, भारत व मेक्सिको जैसे 11 प्रमुख देशों में मुद्रास्फीति की दर 6% से ज्यादा चल रही है। इससे निपटने के लिए तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ रही हैं। अपने रिजर्व बैंक ने तो दो महीने के भीतर दो बार ब्याज दर बढ़ा दी। पहलीऔरऔर भी

जब अच्छी-खासी बड़ी और सफल बिजनेस कर रही कंपनियों के शेयर सस्ते में मिल रहे हों, तब छोटी व अनिश्चित भविष्य वाली कंपनियों की तरफ क्यों झांकना? इस समय अपना शेयर बाज़ार हमें तमाम अवसर दे रहा है। लेकिन केवल कंपनी ही नहीं, बल्कि यह भी देखें कि वह जो बिजनेस कर रही है, उसका अतीत, वर्तमान व भविष्य कितना मजबूत है। दुनिया के सफलतम निवेशक वॉरेन बफेट का फॉर्मूला यही है कि स्टॉक्स या कंपनियां नहीं,औरऔर भी

अक्टूबर-नवंबर में जब अपना शेयर बाज़ार कुलांचे भर रहा था, तब डेरिवेटिव सेगमेंट में मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL) 32-34% चल रही थी। दिसंबर में यह घटकर 28-29% पर आ गई और अभी 17-18% पर है। जाहिर है कि इस वक्त ट्रेडरों में रिस्क लेने का दम नहीं दिख रहा। अब इस लिमिट से जुड़े दो सैद्धांतिक सवाल। क्या समूचे बाज़ार की MWPL बढ़ते-बढ़ते 100% तक पहुंच सकती है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि 3-4% पहलेऔरऔर भी

मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL) कहां तक पहुंच जाए तो माना जा सकता है कि शेयर बाज़ार अब तलहटी पकड़ चुका है और अब तेज़ी का रुख वापस आ रहा है? जानकार बताते हैं कि यह सीमा कम से कम 30-32% तक पहुंच जाए और कुछ दिनों तक बराबर इसके आसपास या इससे ऊपर बनी रहे, तब माना जा सकता है कि तेज़ी का सूरज अब उगने जा रहा है। अभी तो स्थिति यह है कि बीतेऔरऔर भी