देश में आर्थिक विकास की उलटबांसी चल रही है। खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि में हमारी 44.1% श्रमशक्ति को रोजगार मिला हुआ था और मैन्यूफैक्चरिंग में 12.1% को। वित्त वर्ष 2021-22 तक विकास की ऐसी कर्मनाशा बही कि कृषि में लगी श्रमशक्ति बढ़कर 45.5% और मैन्यूफैक्चरिंग में घटकर 11.6% हो गई। श्रमशक्ति से बाहर निकलकर देखें तो देश की 60-70% आबादी अब भी किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भरऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिम बजट को समावेशी व इनोवेटिव बताया है। मगर यह न तो समोवेशी है और न ही इनोवेटिव। जिस विकास में रोज़गार ही नहीं बन रहा, वो समावेशी कैसे हो सकता है? खुद सरकार के आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार देश में नियमित वेतन वाला रोज़गार पांच साल से ठहरा हुआ है। अधिकांश रोजगार जो बना है, वो अवैतनिक पारिवारिक श्रम या प्रछन्न बेरोज़गारी है। कृषि में वास्तविक मजदूरी घटी है।औरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनके तमाम मंत्री-संत्री दावा कर रहे हैं कि 2014 से पहले भारत दुनिया की उन पांच नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा था जो विकास की फंडिंग के लिए अविश्सनीय विदेशी निवेश पर निर्भर थे। लेकिन साथ ही उनका दावा है कि 2014 से 2023 के बीच देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) दोगुना होकर 596 अरब डॉलर रहा है। इतना नकलीपना क्यों? पहले जो विदेशी निवेश कमज़ोरी की निशानी था, वहीऔरऔर भी

बजट की झांकी निकल गई। अब आम चुनावों की रैलियां निकलने लगी हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर बनने से पीढ़ियों का इंतज़ार खत्म हुआ। उन्होंने 17वीं लोकसभा का अंतिम सत्र राम के नाम कर दिया। दरअसल, राम को घोड़ा बनाकर भाजपा चुनावों का अश्वमेध यज्ञ पूरा करना चाहती है। लेकिन उसे भरोसा नहीं कि राम का सिक्का कितना चल पाएगा। इसीलिए 2004 से 2014 तक कांग्रेस के राज में अर्थव्यवस्था के हाल परऔरऔर भी

सरकार पिछले कई सालों से अपने बूस्टर डोज़ से अर्थव्यवस्था से चलाए जा रही है, जबकि उद्योग, कॉरपोरेट और हाउसहोल्ड या आम लोगों की खपत व निवेश में ठंडक दिखाई दे रही है। हकीकत यह है कि अर्थव्यवस्था में उद्योग के निवेश और आम लोगों की खपत का योगदान 83% है। वहीं, केंद्र व राज्य सरकारों का योगदान बमुश्किल 17% है। ऐसे में पूंजीगत व्यय और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च का कितना भी हल्ला सरकार मचा ले, वोऔरऔर भी

बजट अंतरिम हो या पूरा, उसमें सरकार की प्राप्तियों व व्यय का व्यापक ब्योरा होता है और व्यय प्राप्तियों से जितना ज्यादा होता है, सरकार उसे राजकोषीय घाटा दिखाकर देशी-विदेशी उधार से पूरा करती है। लेकिन इस बार के अंतरिम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्राप्तियों में गजब की ‘कलाकारी’ की है। उन्होंने चालू वित्त वर्ष 2023-24 की कुल प्राप्तियां बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में कमोबेश बराबर दिखाई हैं। बजट अनुमान ₹45,03,097 करोड़ औरऔरऔर भी

ठीक चुनावों के पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए सरकार किस कदर नोट बहाने जा रही है, यह हकीकत इस साल के बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और दिसंबर तक के वास्तविक खर्च पर नज़र डालने से खुल जाती है। मसलन, चालू वित्त वर्ष 2023-24 के लिए ग्रामीण विकास विभाग के खर्च का बजट अनुमान ₹1,57,545 करोड़ और संशोधित अनुमान ₹1,71,069 करोड़ है, जबकि कंट्रोलर जनरल ऑफ एकाउंट्स (सीजीए) के मुताबिक दिसंबर 2023 तक वास्तविक खर्च ₹1,07,912 करोड़औरऔर भी

तिलिस्म इतना घना है कि कई निष्पक्ष अखबार तक अभिभूत हैं कि भले ही यह अंतरिम बजट चुनावों के बाद पूरा बजट पेश करने तक के रूटीन खर्च के लिए लेखानुदान था। फिर भी मोदी सरकार ने राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए किसी लोकलुभावन उपाय की ज़रूरत नहीं समझी और चुनावी हित के बजाय ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र का पालन किया। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने इसे देश के भविष्य निर्माण का बजट बताया और कहाऔरऔर भी

इस बार के अंतरिम बजट में शब्दों, वादों व दावों के नीचे जाएं तो आपको झूठ, धोखा, फरेब व छद्म ही नज़र आता है। पिछले साल के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि लगातार तीसरे साल पूंजीगत व्यय 33% बढ़ाकर ₹10 लाख करोड़ किया जा रहा है। इस साल उन्होंने कहा कि इसे नए वित्त वर्ष में 11.1% बढ़ाकर ₹11,11,111 करोड़ किया जा रहा है। लेकिन यह नहीं बताया कि चालू वित्त वर्षऔरऔर भी

जब बड़े-बड़े अर्थशास्त्री से लेकर रेटिंग एजेंसियां तक कह रही थीं कि चालू वित्त वर्ष 2023-24 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.9% तक सीमित रखने का लक्ष्य नहीं पूरा हो सकता, तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे 5.8% तक सिमटाने का कमाल दिखा दिया। यही नहीं, जब कहा जा रहा था कि अगले वित्त वर्ष 2024-25 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 5.3% रखा जा सकता है, तब वित्त मंत्री ने इसे 5.1% परऔरऔर भी