मोदी सरकार प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या वाणिज्य मंत्री नहीं, बल्कि अफसरों व सरकारी सूत्रों के हवाले दम भर रही है कि वो 75 देशों को ट्रम्प से मिली 90 दिन की मोहलत में भारत के व्यापारिक हितों की न केवल रक्षा कर लेगी, बल्कि होड़ में चीन, बांग्लादेश, वियतनाम व इंडोनिशिया जैसे तमाम देशों को मात दे देगी। हालांकि दबे स्वर से उसे मानना पड़ रहा है कि ट्रम्प के टैरिफ दबाव से भारत में न केवलऔरऔर भी

मोदी सरकार ने अपने टुच्चे स्वार्थ के लिए भारत को अमेरिका और चीन के दो पाटों के बीच बुरी तरह फंसा दिया है। वो ट्रम्प के 26% जवाबी टैरिफ का विरोध इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि अमेरिका में न्याय विभाग की सघन जांच के बाद न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने गौतम अडाणी के खिलाफ रिश्वतखोरी और फ्रॉड का अभियोग तय कर दिया है। इस पर पिछले महीने हेग कन्वेंशन के तहत भारत सरकार को अहमदाबाद कीऔरऔर भी

चीन ने राष्ट्रवाद का दम दिखा दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन के आयात पर पहले के 20% के ऊपर 34% टैरिफ (कुल 54%) लगाया तो उसने भी अपने यहां सारे अमेरिकी माल के आयात पर 34% शुल्क लगा दिया। ट्रम्प ने जवाब में 104% टैरिफ लगा दिया तो चीन ने भी टैरिफ बढ़ाकर 84% कर दिया। ट्रम्प ने झल्लाकर चीनी माल पर आयात शुल्क 145% कर दिया तो चीन ने उसका जवाब 125% शुल्क सेऔरऔर भी

टैरिफ युद्ध पर दुनिया के सबसे ज्यादा आयात करनेवाले देश अमेरिका और सबसे ज्यादा निर्यात करनेवाले देश चीन के बीच वार-पलटवार जारी है। अमेरिका के 54% के जवाब में चीन में 84% टैरिफ लगाया तो अमेरिका ने उसे पहले बढ़ाकर 104% और फिर 125% कर दिया। 27 देशों के यूरोपीय संघ ने अमेरिका के 20% आयात शुल्क के जवाब में 25% आयात शुल्क का ऐलान कर दिया। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी तक खामोश हैं, जबकिऔरऔर भी

चीन ने सारे अमेरिकी आयात पर 34% शुल्क लगाकर जवाब दे दिया। फिर ट्रम्प ने पलटकर उस पर 50% टैरिफ बढ़ाकर 104% कर डाला। लेकिन जवाबी टैरिफ पर अभी तक भारत का कोई जवाब नहीं आया है। मोदी जी चुप हैं। देश के आम लोग तो औरंगजेब की कब्र के बाद वक्फ की जमीन के कब्जे में उलझे हैं। लेकिन कॉरपोरेट क्षेत्र टैरिफ युद्ध पर सरकार के पस्त रवैये से परेशान है। उसे लगता है कि अमेरिकाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार का साफ संदेश है कि डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जवाबी टैरिफ लगाना न अमेरिका के लिए अच्छा है, न बाकी दुनिया या भारत के लिए। फिर भी हमारे देश का गोदी मीडिया और सरकार के बिके हुए अर्थशास्त्री शोर मचाए जा रहे हैं कि अमेरिका का टैरिफ लगाना भारत के लिए लाभप्रद है। खुद सरकार में बोलने की हिम्मत नहीं तो सूत्रों के हवाले खबरें चलाई जा रही हैं। ये वही सूत्र व अर्थशास्त्री हैं जोऔरऔर भी

डोनाल्ड ट्रम्प के जवाबी टैरिफ पर मेक्सिको, कनाडा, यूरोपीय संघ और चीन से लेकर वियतनाम व बांग्लादेश तक पलटकर वार कर रहे हैं। लेकिन भारत सरकार चुप है। अधिकारिक सूत्रों के हवाले कहा जा रहा है कि भारत को ज्यादा चिंतित होने की ज़रूरत नहीं क्योंकि उसके प्रतिस्पर्धी देशों पर ज्यादा टैरिफ लगाया गया है जिसका फायदा हमें मिलेगा। वे इस हकीकत को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका में होनेवाले आयात में भारत काऔरऔर भी

अमेरिका द्वारा भारत से होनेवाले आयात पर जवाबी शुल्क लगा देना कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा अहम हमला है। लेकिन जिस दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जवाबी शुल्क का ऐलान कर रहे थे, उसी दिन देश की संसद को वक्फ संशोधन बिल पर उलझा देने से जगजाहिर हो गया है कि भाजपा और मोदी सरकार के लिए राष्ट्रहित की अहमियत ज्यादा है या राजनीतिक स्वार्थ की? इस सरकार ने पहले तो बजट में अमेरिकी माल वऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को देश का प्रधानसेवक बताने से नहीं थकते। लेकिन मोदी सरकार किसकी मालिक और किसकी गुलाम हैं, इसे समझने के लिए केवल एक उदाहरण काफी है। बजट से पहले आम से लेकर खास तक, सभी लोग मांग कर रहे थे कि बीमा प्रीमियम पर लिया जा रहा 18% जीएसटी खत्म या कम कर दिया जाए। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। वहीं, केंद्र सरकार 2016 से हीऔरऔर भी

यूं तो अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भारत को कोई खास अहमियत नहीं है। उसके कुल व्यापार में भारत का हिस्सा 2% से भी कम है। लेकिन वो भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझीदार देश है। वित्त वर्ष 2024-25 में दिसंबर 2024 तक के नौ महीनों में भारत का कुल व्यापार 868.60 अरब डॉलर रहा है, जिसमें से अमेरिका का हिस्सा 95.02 अरब डॉलर या 10.94% था। यही नहीं, इस अवधि में अमेरिका के साथ भारतऔरऔर भी