युद्ध में बढ़-चढ़कर दावे किए जाते हैं और सतर्क से सतर्क मीडिया तक के पास कोई साधन नहीं होता कि वो पक्के तौर पर कह सके कि किसके दावे सहीं हैं और किसके गलत। लेकिन अपने यहां तो विचित्र स्थिति है। यहां तो लगता है कि खुद भारत सरकार ही देश की सैन्य स्थिति पर भारत की जनता के साथ युद्ध लड़ रही है और हमारे पास दीदा फाड़कर देखने के अलावा कोई चारा नहीं है। ऑपरेशनऔरऔर भी

इनका राष्ट्रवाद हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान कर भोले-भाले देशवासियों का वोट बटोरने तक सीमित है। इसका प्रमाण इन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना के शौर्य व बलिदान को भुनाने के लिए देश भर तिरंगा यात्रा निकाल कर दे दिया। लेकिन जब भी देशहित की रक्षा की बात आती है तो इनकी रीढ़ की हड़्डी गायब हो जाती है। चाहे वो जून 2020 में गलवान घाटी में चीन द्वारा हमारी 4000 वर्ग किलोमीटर ज़मीन कब्जा करने का मामला होऔरऔर भी

भारत को 2047 तक विकसित देश बनाना अब विशुद्ध जुमला बन गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि अभी तक सरकार ने इसका कोई ठोस रोडमैप नहीं पेश किया है। अब तो देश के बाहर ही नहीं, भीतर से भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। स्टार्टअप फंडिंग से जुड़ी प्रमुख कंपनी ट्रेमिस कैपिटल के सह-संस्थापक पुष्कर सिंह का कहना है कि 2024 में भारत की अर्थव्यवस्था 3.93 ट्रिलियन डॉलर की थी, जबकि चीन की अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

डॉ. मनमोहन सिंह की दस साल की सरकार की बात अब पुरानी हो चुकी है। उन्होंने विकास का वैसा नारा भी नहीं दिया था, जैसा पिछले 11 साल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दे रहे हैं। मेक-इन इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसे नारों की कोई कमी नहीं। ऊपर से हमारे 60 करोड़ देशवासियों की उम्र 25 साल से कम है। इसका बखान खुद हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तीन हफ्ते ही पहले अमेरिका में कर चुकीऔरऔर भी

साल 1980 में चीन का जीडीपी भारत का 1.63 गुना था। लेकिन आज वो भारत का 4.72 गुना हो चुका है। आखिर हमारे विकास के रास्ते में कहां चूक हो गई? 1980 में चीन की आबादी भारत के कहीं ज्यादा थी। इसकी वजह से भारत की प्रति व्यक्ति आय 582 डॉलर थी, जबकि चीन की प्रति व्यक्ति आय इसकी लगभग आधी 307 डॉलर ही थी। साल 1990 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय घटकर 367 डॉलर होऔरऔर भी

युद्ध-विराम की घोषणा हो चुकी है। फिर भी देश का खास-ओ-आम अब भी युद्ध के उन्माद में उलझा हुआ है। उसे कौन समझाए कि यह विनाश का रास्ता है, विकास का नहीं। ऐसे उन्माद से दुनिया की हथियार लॉबी और राजनीतिक सत्ता का ही स्वार्थ सधता है। बाकी किसी का नहीं। इसके बजाय देश में विकास पर व्यापक बहस होनी चाहिए जिसमें हर किसी को शामिल किया जाए, शहर-शहर, गांव-गांव, गली-गली, चाय व पान की दुकानों औरऔरऔर भी

विकास का इतना छोटा, स्वार्थी व बेहद सकीर्ण नज़रिया आखिर खुद के राष्ट्रवादी होने का डंका पीटनेवाली किसी पार्टी और सरकार का कैसे हो सकता है? लेकिन हकीकत यही है कि मोदी सरकार के पिछले 11 साल में मुठ्ठी भर कॉरपोरेट घरानों का धंधा, मुनाफा व साम्राज्य दिन दूना, रात चौगुना की रफ्तार से बढ़ा है। मगर, देश का व्यापक मजदूर, किसान, अवाम व मध्यवर्ग ही नहीं, उनके उपभोग पर टिका कॉरपोरेट क्षेत्र भी अब त्राहिमाम करऔरऔर भी

पहलगाम के नृशंस आतंकी हमले के बाद देश में राष्ट्रवाद के उन्माद को ऑपरेशन सिंदूर ने चरम पर पहुंचा दिया है। लेकिन राष्ट्रवाद सीमा पर युद्ध लड़कर ही नहीं, सीमा के भीतर रोज़गार जैसी विकट समस्याओं से लड़ने और औद्योगिक विकास को बढ़ाने से भी मजबूत होता है। अगर हम देश में मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ा लें तो चीन को सीमा से लेकर हर स्तर पर तगड़ी चुनौती दे सकते हैं। तब हमें गलवान घाटी में उसकी घुसपैठऔरऔर भी

जिस दिन कश्मीर में मिनी स्विटज़रलैंड कहे जानेवाले पहलगाम की बैसरन घाटी में आतंकी देश के कोने-कोने से आए सैलानियों को गोलियों से भून रहे थे, उसी दिन हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अमेरिका में कैलिफोर्निया की स्टैंफोर्ड यूनिवर्सिटी के हूवर इंस्टीट्यूशन में भाषण दे रही थीं। उन्होंने कहा कि भारत में युवा कार्यशक्ति को सोखने, आयात निर्भरता कम करने और प्रतिस्पर्धी वैश्विक सप्लाई श्रृंखला बनाने के लिए मैन्यूफैक्चरिंग को स्केल-अप करना ज़रूरी है। उनका कहना थाऔरऔर भी

मोदी सरकार ने 2023-24 की आर्थिक समीक्षा में कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था को 2030 तक हर साल कृषि क्षेत्र से बाहर 78.5 लाख रोज़गार पैदा करने पड़ेगे। साथ ही 35 लाख लोगों को हर साल कृषि से बाहर निकालकर गैर-कृषि क्षेत्र में रोज़गार देने का इंतज़ाम करना होगा। कुल मिलाकर 113.50 लाख नए रोज़गार हर साल। लेकिन 2024-25 की ताज़ा आर्थिक समीक्षा बताती है कि सरकार कृषि क्षेत्र से निकालकर लोगों को मैन्यूफैक्चरिंग व सेवा क्षेत्रऔरऔर भी