देश में 1991 के आर्थिक उदारवाद की शुरुआत के तीन-चार साल बाद ही कुछ जन-पक्षधर अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि जीडीपी की गणना में कितने भी डिफ्लेटर शामिल कर लिए जाएं और मुद्रास्फीति के प्रभाव को खत्म कर लिया जाए, लेकिन चूंकि वो उत्पादन पर ही ज्यादा फोकस करता है, इसलिए अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर नहीं पेश करता। उनका कहना था कि जीडीपी की गणना में उत्पादन और मुद्रास्फीति जितना ही महत्व बेरोज़गारी की स्थिति को दियाऔरऔर भी

विकासशील देश में सरकार का एजेंडा विकास ही हो सकता है। लेकिन किसका विकास? लोकतांत्रिक देश में सरकार और जनता के एजेंडे में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। भारत तो दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है। सालों-साल से बखाना जा रहा है कि हमारी 65% आबादी 35 साल से नीचे की है। इसे हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड भी कहा जाता है। आखिर फिर क्यों हमारे आर्थिक विकास के केंद्र में नौजवान और उसका रोज़गार नहींऔरऔर भी

आज की तारीख बड़ी अहम है। ठीक 95 साल पहले 23 मार्च 1931 को 23-23 साल के ही तीन नौजवानों भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु ने ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाकर भारत का सुंदर भविष्य बनाने के लिए सरकार से माफी मांगने के बजाय फांसी पर चढ़ना कुबूल किया था। भगत सिंह ने फांसी पर चढ़ने के ठीक पहले देशवासियों को एक ही संदेश दिया: साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, इंकलाब ज़िंदाबाद। फांसी के ठीक पहले तीनों नेऔरऔर भी

कोई देखता नहीं, कोई पूछता नहीं तो सरकार कुछ भी बोलकर चली जाती है। देश में रेअर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) बनाने की ₹7280 करोड़ की नई स्कीम में सात साल के भीतर 6000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट प्रतिवर्ष बनाने के लिए पूंजी व प्रोत्साहन दिए जाएंगे। हकीकत यह है कि देश में इस समय सालाना 7000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट की खपत होती है। अगर नई स्कीम सफल भी हो गई और साल 2030 तक देशऔरऔर भी

जिनका मकसद येनकेन प्रकारेण सत्ता हासिल करना और फिर उसका इस्तेमाल दलगत व व्यक्तिगत हितों के लिए करना हो, उनके लिए राष्ट्रीय हित जनता को लुभाने के जुमले भर बनकर रह जाते हैं। दुनिया के उद्योग-धंधों में रेअर अर्थ का महत्व 15 साल पहले तब उभरकर सामने आया है, जब चीन ने इन तत्वों के खनन में एकाधिकार जमाकर सबको छकाना शुरू कर दिया। जर्मन ऑटो कंपनी बीएमडब्ल्यू तो नियो-डाइमियम के दामों मे उछाल के बाद 2011औरऔर भी

देश ने आज़ादी के फौरन बाद रेअर अर्थ खनिजों या तत्वों का महत्व समझ लिया था। नेहरू के दौर में ही 18 अगस्त 1950 को बाकायदा इंडियन रेअर अर्थ्स लिमिटेड बना ली गई। इसकी रेअर अर्थ डिवीज़न ने केरल के अलूवा में काम करना शुरू कर दिया। फिर साल 1963 में इसे भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत काम करनेवाली सरकारी कंपनी बना दिया गया। इसी के साथ उसने केरल और तमिलनाडु की कुछ जगहोंऔरऔर भी

आज के दौर में 17 रेअर अर्थ खनिज मजबूत व समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला बन गए हैं। ये खनिज दरअसल धरती के भीतर पाए जानेवाले ऐसे तत्व हैं जो हरित ऊर्जा तक पहुंचने से लेकर देश के डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर व सोलर पैनल जैसे उद्योगों के लिए बेहद ज़रूरी हैं। लेकिन खुद को राष्ट्रवादी बतानेवाली मोदी सरकार ने अपने 12 सालों के शासन में इन दुर्लभ तत्वों की प्राप्ति के लिए कुछ भी सार्थकऔरऔर भी

राष्ट्रवादी सरकार वही है तो देश के प्राकृतिक व मानव संसाधनों का अधिकतम न हो सके तो अभीष्टतम विकास करे। मैक्सिमम नहीं तो ऑप्टिमम। यही देश को आत्मनिर्भर बनाने का भी असली सूत्र है। बाकी सब फालतू बातें और खोखले नारे हैं। मोदी सरकार के राष्ट्रवादी होने के दावे को इसी आधार पर परखा जाना चाहिए। मानव संसाधनों पर यह सरकार 12 सालों में पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुकी है। अभी प्राकृतिक संसाधनों पर उसको परखा जानाऔरऔर भी

जिस अर्थव्यवस्था के आकार को लेकर सरकार पिछले कई साल से डींग मार रही थी कि हम दुनिया की पांचवीं के बाद चौथी अर्थव्यवस्था बन गए हैं और जल्दी ही तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, उसका आकार 2022-23 को आधार वर्ष बनाते ही घट गया है। पुरानी सीरीज़ में 2022-23 में अर्थव्यवस्था का आकार या नॉमिनल जीडीपी ₹268,90,473 करोड़ था, जो नई सीरीज़ में इससे 2.9% कम ₹261,17,627 करोड़ निकला है। इसी तरह 2023-24 में नॉमिनलऔरऔर भी

मोदी सरकार की विशेषता यह है कि उसने अर्थव्यवस्था के हिसाब-किताब में सतही को असली और असली को नकली बना दिया है। पहले हम नॉमिनल जीडीपी के बजाय रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर को देखते थे। लेकिन रीयल विकास दर अब इतनी नकली हो गई है कि असली तस्वीर जानने के लिए नॉमिनल या सतह पर तैरती विकास दर को देखना पड़ता है। लेकिन यह करतब भी काम नहीं कर रहा। चालू वित्त वर्ष 2025-26 मेंऔरऔर भी