सब नया व अपडेट, मगर रोज़गार नहीं!
देश में 1991 के आर्थिक उदारवाद की शुरुआत के तीन-चार साल बाद ही कुछ जन-पक्षधर अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि जीडीपी की गणना में कितने भी डिफ्लेटर शामिल कर लिए जाएं और मुद्रास्फीति के प्रभाव को खत्म कर लिया जाए, लेकिन चूंकि वो उत्पादन पर ही ज्यादा फोकस करता है, इसलिए अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर नहीं पेश करता। उनका कहना था कि जीडीपी की गणना में उत्पादन और मुद्रास्फीति जितना ही महत्व बेरोज़गारी की स्थिति को दियाऔरऔर भी
