ऐसा कौन-सा वयस्क होगा जो नहीं जानता कि उसकी वित्तीय ज़रूरतें और सीमाएं क्या हैं? वह नहीं जानता तो यह कि कौन-से स्टॉक्स और म्यूचुअल फंड स्कीम्स में निवेश करे। वह यह भी नहीं जानता कि शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग का रिस्क क्या है और उसे कितना रिस्क लेना चाहिए कि उसकी लुटिया न डूब जाए। समस्या यह कि उसे यह ज्ञान करानेवाला कोई ईमानदार मंच अपने यहां नहीं है। कहने को जो विद्वान, इक्विटीऔरऔर भी

जापान के शेयर बाज़ार में नब्बे के दशक में आंख मूंदकर लम्बा निवेश करनेवाले लोग आज खून के आंसू रो रहे होंगे। वे अगर अपने देश की अर्थव्यवस्था की हालत से वाकिफ रहे होते तो उनकी यह स्थिति नहीं होती। लेकिन शेयर बाज़ार की चकाचौंध और टेक्निकल बातों में उलझे विद्वान कहते हैं कि ब्याज, राजकोषीय हालत, मुद्रास्फीति, कच्चे तेल की कीमत, आयात-निर्यात का संतुलन, क्वांटिटेटिव ईजिंग या नोट छापकर सिस्टम में डालने जैसी तमाम जानकारियां वऔरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था से शेयर बाज़ार की हालत कैसे सीधे-सीधे प्रभावित होती है, यह जानना है तो जापान का हाल देख लेना चाहिए। विद्वान लोग कहते हैं कि शेयर बाजार लम्बे समय यानी 10-20 साल में पक्का और अच्छा रिटर्न देता है। यह बात भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यकीनन सही है। लेकिन जापान जैसे विकसित देश के लिए नहीं। जापान कोई छोटा-मोटा देश नहीं है। वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। जर्मनी उससेऔरऔर भी

जिस शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग से हम कमाना चाहते हैं, वह हवा या किसी निर्वात में नहीं होता। उसका सीधा रिश्ता देश की अर्थव्यवस्था से होता है। आज ग्लोबल हो चुकी दुनिया में देश की अर्थव्यवस्था दुनिया की स्थिति से प्रभावित होती है। 2008 का वित्तीय संकट आया था अमेरिका में। पर उसने सारी दुनिया की चूलें हिलाकर रख दीं। फिर, वित्तीय जगत तो अमेरिका से लेकर यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया तक, दुनिया के इस कोनेऔरऔर भी