हिंदी पृष्ठभूमि से आने, मगर अंग्रेज़ी से कमानेवाले कुछ विद्वान बंधुओं का कहना है कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग व निवेश से कमाने की चाह रखनेवाले लोगों के लिए यह जानना कतई जरूरी नहीं है कि देश व दुनिया की अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है? यूरोप व अमेरिका में आर्थिक मंदी के क्या आसार हैं, ब्याज दर बढ़ रही है या घट रही है या देश का डेमोग्रैफिक डिविडेंड क्या है, बेरोज़गारी व शिक्षा की क्या स्थितिऔरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था या जीडीपी बढ़ता है तो शेयर बाज़ार बढ़ता है। लेकिन ऐसा तुरत-फुरत नहीं होता। दोनों का रिश्ता सीधा नहीं, समय सापेक्ष है। कारण, जहां जीडीपी अतीत को दर्शाता है, वहीं शेयर बाज़ार भविष्य को सोचकर चलता है। भारत भले ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन अंदर से इसकी हालत अच्छी नहीं है। फिर भी शेयर बाज़ार बढ़ रहा है क्योंकि भारत का भविष्य संभावनाओं से भरा हुआ है। भारत से बड़ीऔरऔर भी

सरकार की तरफ से कहा जाता है कि उसने 2014 में डूबने के कगार पर पहुंच चुकी देश की अर्थव्यवस्था को बचा लिया। निहित स्वार्थों के चलते सरकार से जुड़े देशी-विदेशी कॉरपोरेट संस्थान और अर्थशास्त्री तक बताने से नहीं थकते कि भारत को 2014 में नाज़ुक अवस्था में पहुंच चुकी दुनिया की पांच कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था, जबकि आज वह सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। हकीकत यह है कि मार्च 2014 से मार्चऔरऔर भी

इंसान से लेकर हाथी, घोड़ा, गाय-बैल, सांप, छिपकली, मेढक, मगरमच्छ व चिड़ियों तक धरती पर जितने भी 69,963 किस्म के रीढ़वाले या कशेरुकी (vertebrates) जीव-जन्तु हैं, उन्होंने देखने की क्षमता वाली अपनी आंखें एक बैक्टीरिया के जीन से हासिल की है। यह सच अप्रैल 2023 में पीएनएएस (प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज) की वेबसाइट पर प्रकाशित एक शोधपत्र में उजागर किया गया है। दरअसल, हमारी आंखों की संरचना इतनी जटिल है कि विकासवाद का मूलऔरऔर भी

सात दिन पहले सरकार का आखिरी अनुमान आया कि वित्त वर्ष 2022-23 में देश का जीडीपी 160.06 लाख करोड़ रुपए रहा है जो पिछले वित्त वर्ष 2021-22 के जीडीपी 149.26 लाख करोड़ रुपए से 7.2% ज्यादा है। तालियां बजती रहीं कि यह तो 7% के पिछले अनुमान को भी पार कर गई। लेकिन इसे कृषि की 4% और सेवा क्षेत्र की 9% विकास दर के दम पर हासिल किया गया है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर इसऔरऔर भी