ऐसा क्यों है कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में शेयर बाज़ार के 95% ट्रेडर घाटे में रहते हैं और केवल 5% ही मुनाफा कमाते हैं? इसकी दो वजहें हैं। पहली यह कि ज्यादातर ट्रेडर अपने आगे हर किसी को गधा समझते हैं। दूसरी अहम वजह यह है कि वे टिप्स या टेक्निकल एनालिसिस की गणनाओं पर उछलकूद मचाते हैं। मगर असली कुंजी, धन प्रबंधन के अनुशासन को तवज्जो नहीं देते। चलिए, देखें अब बाज़ार की धूप-छांह…औरऔर भी

तकरीबन सारे के सारे ट्रेडर मानकर चलते हैं कि कंपनी के साथ जो कुछ हो रहा है, वह उसके शेयर के भावों में झलक जाता है। इसलिए अकेले टेक्निकल एनालिसिस से उनका कल्याण हो जाएगा। वे फंडामेंटल एनालिसिस की कतई परवाह नहीं करते। यह एकांगी और नुकसानदेह नजरिया है क्योंकि भाव अंततः जिस मूल्य की तरफ बढ़ते हैं वो कंपनी के फंडामेंटल्स, उसके धंधे की स्थिति से ही तय होता है। अब रुख आज के बाज़ार का…औरऔर भी

हम जितना देख पाते हैं, उतना मानकर चलते हैं। धरती वही। पहले सपाट मानते थे, अब गोल है। मानने को बदल दें तो देखने का फ्रेम/संदर्भ बदल जाता है, तथ्य बदल जाते हैं। मानिए तो शंकर है, कंकर है अन्यथा। यह आस्था की बात है। लेकिन ट्रेडिंग करते वक्त आस्था नहीं, सत्य की दृष्टि काम आती है। जो अपनी धारणाओं से निकलकर जितना सत्य देख पाता है, उतना कामयाब होता है। धारणाओं से ऊपर उठकर देखें बाज़ार…औरऔर भी

जीवन अनिश्चितता से भरा है। किसे पता था कि रुपए को संभालने के लिए उठाए गए रिजर्व बैंक के कदम उल्टे पड़ जाएंगे और शेयर बाज़ार इस कदर टूट जाएगा। ऐसी आकस्मिकताओं के साथ हमें छोटी-छोटी समस्याओं के लिए भी तैयार रहना चाहिए। जैसे, कंप्यूटर ने काम करना बंद कर दिया या नेट कनेक्शन गड़बड़ा गया तो हम क्या करेंगे। मन ही मन इनसे मुकाबले का अभ्यास कर लेना चाहिए। अब आज के बाज़ार की दशा दिशा…औरऔर भी

हम अपनी मान्यताओं और धारणाओं से इतने बंधे होते है कि हम ट्रेडिंग या निवेश शेयर बाज़ार की वास्तविक स्थिति के हिसाब से नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं और धारणाओं के हिसाब से करते हैं। लेकिन शेयर बाज़ार ही नहीं, किसी भी क्षेत्र में कामयाबी की पहली शर्त यह है कि हम मुक्त मन और खुले दिमाग से काम करें। तब हमें अपनी धारणाओं की सीमा और निरर्थकता भी साफ दिखती है। अब पकड़ते हें बाज़ार की चाल…औरऔर भी

एक ही साथ दो खेमों का खेल। एक में बढ़ने का भरोसा, दूसरे में गिरने का विश्वास। दोनों अपनी जगह अटल। लेकिन परकाया प्रवेश में माहिर। नेताओं से भी ज्यादा मौकापरस्त। तेजड़िया जब चाहता है मंदड़िया बन जाता है और मंदड़िया तेजड़िया। आप भी कभी पाला बदलकर सोचिए। खरीदा है तो बेचने और बेचा है तो खरीदनेवाले की नज़र से। बाज़ार का मन समझने के लिए यह अभ्यास बहुत ज़रूरी है। अब ढूंढते हैं मौके ट्रेडिंग के…औरऔर भी

बाज़ार को लेकर हर किसी की अपनी-अपनी धारणा है, स्टाइल है। जैसे कुछ लोग कहां पर एंट्री मारनी है, इसको खास तरजीह ही नहीं देते। उनका कहना है कि ट्रेडिंग में एंट्री निश्चित रूप में महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे कम। अहम बिंदु वो है जब कोई स्टॉक ट्रेंड बदल रहा हो क्योंकि इस मोड़ पर रिस्क और रिवॉर्ड का अनुपात सबसे बेहतर होता है। जोखिम कम से कम और रिटर्न ज्यादा से ज्यादा। अब, मंगल की ग्रहदशा…औरऔर भी

शेयर, कमोडिटी या फॉरेक्स बाज़ार में ट्रेडिंग करना बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के ट्रेजरी विभाग के लिए बड़ा व्यवस्थित काम है। लेकिन किसी भी व्यक्ति के लिए ट्रेडिंग तने हुए रस्से पर चलने जैसा है। ज़रा-सा चूके तो गए नीचे। इस तनाव से निजात पानी है तो सेफ्टीनेट के बगैर काम नहीं चल सकता। तब लड़खड़ा कर गिरे भी तो यह नेट आपको बचा लेगा। खतरा कम, हड्डी-पसली सलामत। अब रुख करते हैं आज के बाज़ार का…औरऔर भी

विचार और विश्वास धीरे-धीरे हमारी आदत का हिस्सा बन जाते हैं। फिर इन्हीं के चश्मे से हम सच को देखने लगते हैं और वो टेढ़ामेढ़ा हो जाता है। विकृत सच हमें गलत एक्शन को उकसाता है। हम हारने और खीझने लगते हैं। लेकिन आदत की ताकत हासिल कर चुके विचारों को बदला जा सकता है। इसका अचूक तरीका है अभ्यास। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं अभ्यासेन कौन्तेय। अभ्यास को आगे बढ़ाते हुए डालते हैं आज पर नज़र…औरऔर भी

विश्वविजयी होना, सब पर राज करना बड़ी सहज मानवीय इच्छा है। बाज़ार को भी हम मुठ्ठी में कर लेना चाहते हैं। चाहते हैं कि वो हमारे विचार से चले। धीरे-धीरे ऐसे सूत्र का भ्रम पाल लेते हैं जिसकी बदौलत हम न्यूनतम भाव पर खरीदकर उच्चतम पर बेच सकते हैं। तमाम ट्रेडर/निवेशक ऐसा सोचकर दांव पर दांव लगाते जाते हैं। ऐसे लोग ज़िदगी में बहुत सारी नाकामियां झेलने के लिए अभिशप्त हैं। कैसे बचें इससे, आइए देखते हैं…औरऔर भी