कामयाब ट्रेडर कंपनी या अर्थव्यवस्था के मूलभूत पहलुओ पर ट्रेड नहीं करता। लेकिन वो इनसे वाकिफ ज़रूर रहता है। यह जानना ज़रूरी है कि अर्थव्यवस्था की समग्र तस्वीर क्या है और कंपनी की क्या स्थिति है, भले ही हम उसके आधार पर रोज़-ब-रोज़ के ट्रेड न करें। भावों की चाल और सौदों का वोल्यूम देखकर हम चार्ट पर लोगों की भावनाओं को पकड़ते हैं। याद रखें। लोग झूठ बोल सकते हैं, चार्ट नहीं। अब ट्रेडिंग बुधवार की…औरऔर भी

मेरे एक मित्र हैं। बता रहे थे कि कैसे उन्होंने एक सेमिनार में ट्रेडिंग सिखानेवाले इंस्ट्रक्टर की धज्जियां उड़ा दीं। उसने कहा कि कम-से-कम एक घंटे शांत रहें। लेकिन इन्होंने अपने सवालों से इतना तंग किया कि उसे ट्रेनिंग सेशन छोड़कर जाना पड़ा। मेरा कहना है कि सीखने के लिए विनम्रता ज़रूरी है और गुरु तो एक चींटी भी हो सकती है। ट्रेडिंग में आपके हुनर का इकलौता पैमाना है कि आप कितना कमाते हो। अब आगे…औरऔर भी

इस हकीकत से कोई इनकार नहीं कर सकता कि विदेशी संस्थागत निवेशक हमारे शेयर बाज़ार के सबसे अहम किरदार बन चुके हैं। ऊपर से मई में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बरनान्के की तरफ से बांड खरीद रोकने के हल्के से बयान से जैसा भूचाल मचा, रुपया तक जमींदोज़ हो गया है, उससे साबित हो गया कि अमेरिका का फैसला हमें कभी भी हिला सकता है। इसे समझते हुए आगाज़ करें इस हफ्ते का…औरऔर भी

आपने भी देखा होगा कि किसी स्टॉक के बजाय लोगों की आम दिलचस्पी इसमें होती है कि बाज़ार कहां जा रहा है। जैसे कोई मिलने पर पूछता है कि क्या हालचाल है, उसी तरह शेयर बाज़ार से वास्ता रखनेवाले छूटते ही पूछ बैठते हैं कि सेंसेक्स या निफ्टी कहां जा रहा है। चूंकि सेंसेक्स में शामिल सभी तीस कंपनियां निफ्टी की पचास कंपनियों में शामिल हैं। इसलिए हाल-फिलहाल बाज़ार कहां जा रहा है, का मतलब होता हैऔरऔर भी

एक तरफ अमेरिका का केंद्रीय बैंक उपाय सोच रहा है कि मौजूदा मौद्रिक ढील को कड़ा कैसे किया जाए, हर महीने 85 अरब डॉलर की बांड खरीद के दुष्चक्र से कैसे निकला जाए। दूसरी तरफ डाउ जोन्स सूचकांक गुरुवार को इतिहास में पहली बार 16,000 के पार चला गया क्योंकि बेरोजगारी की दर बिगड़कर 7.3% हो गई है और इसके सुधरकर 6.5% तक आने तक बांड खरीद रुक नहीं सकती। ऐसा है बाज़ार। अब ट्रेडिंग शुक्रवार की…औरऔर भी

इंसान हैं तो भावनाएं हैं और उनका रहना स्वाभाविक भी है। लेंकिन दुनिया में कामयाबी के लिए भावनाओं पर लगाम लगाना पड़ता है। बताते हैं कि भावनात्मक दिमाग और तार्किक दिमाग में 24:1 का अनुपात होता है। पैसे के मामले में हम और भी ज्यादा भावनात्मक हो जाते हैं। हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दिल की ज्यादा सुनते हैं। ट्रेडिंग में कामयाबी के लिए जरूरी है कि हम दिमाग की ज्यादा सुनें। अब रुख बाज़ार का…औरऔर भी

अक्सर हम जैसे आम ट्रेडरों का छोटा-मोटा ग्रुप होता है। यह ग्रुप आपसी राय से सौदे करता है। सभी लगभग समान इंडीकेटरों का इस्तेमाल करते हैं। यह समूह में चलने की सहज पशु-वृत्ति है। इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन समूह के फेर में पड़कर हम मतिभ्रम का शिकार भी हो सकते हैं। फिर, आज इंटरनेट जैसी टेक्नोलॉजी ने सब कुछ इतना व्यवस्थित कर दिया है कि हम अकेले बहुत कुछ कर सकते हैं। अब बुधवार का वार…औरऔर भी

जो लोग भी आपको टिप्स बांटते हैं, चाहे वे ब्रोकर फर्में हों या तथाकथित स्वतंत्र एनालिस्ट, उनसे कभी पूछिए कि इनका आधार क्या है? अगर आधार घोषित/अघोषित खबर है तो यकीन मानिए कि गन्ने का सारा रस निचुड़ जाने के बाद अब खोइया ही बची है। अगर टेक्निकल एनालिसिस है तो वह गुजरे हुए पल के डाटा पर आधारित है। फिर, इसमें तो हज़ारों लोग माहिर हैं तो आप औरों से जीतोगे कैसे! सोचिए। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

इधर कुछ दिन दिल्ली में हूं और भांति-भांति के लोगों से मिलना-जुलना चल रहा है। कल शाम फाइनेंस जगत के खास किरदार से मुलाकात हुई। उनका कहना था कि इस बाज़ार में हमारे-आप जैसे रिटेल/आम निवेशकों का कोई भविष्य नहीं। मैंने इधर-उधर की बातें कर उनके अहं का पूरा ख्याल रखा। लेकिन मन ही मन कहा कि अगर हमारा भविष्य नहीं है तो इस देश की अर्थव्यवस्था का भी कोई भविष्य नहीं है। अब बाज़ार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार ऐतिहासिक ऊंचाई बना चुका है। सेंसेक्स और निफ्टी चढ़ते ही जा रहे हैं। क्या भारतीय अर्थव्यस्था वाकई इतनी मजबूत होती जा रही है कि शेयर सूचकांकों का बढ़ना स्वाभाविक है? कोई भी बता सकता है कि ऐसा कतई नहीं है। बाज़ार बाहर से आ रहे सस्ते धन के दम पर फूल रहा है और जैसे ही अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व हर महीने सिस्टम में 85 अरब डॉलर डालने का सिलसिला रोक देगा, भारत समेतऔरऔर भी