मायानगरी मुंबई, सपनों की नगरी। लोगों के पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां, पर चलाने को सड़क नहीं। हर मिनट पर ट्रेन, पर भीड़ इतनी कि चढ़ना मुश्किल। समुद्र का अथाह जल, मगर मछलियां प्यासी हैं। यहां घुट-घुटकर जीते हैं लोग। सांस लेने की फुरसत नहीं।और भीऔर भी

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जो भी पैदा हुआ है, वह मरेगा। यह प्रकृति का चक्र है, नियम है। ट्रेन पर सवार हैं तो ट्रेन की होनी से आप भाग नहीं सकते। कूदेंगे तो मिट जाएंगे। यह हर जीवधारी की सीमा है। इसमें जानवर भी हैं, इंसान भी। लेकिन जानवर प्रकृति की शक्तियों के रहमोकरम पर हैं, जबकि इंसान ने इन शक्तियों को अपना सेवक बनाने की चेष्ठा की है। इसमें अभी तक कामयाब हुआ है। आगे भी होता रहेगा। मगर, यहांऔरऔर भी

समय और अनिश्चितता, दो ऐसी चीजें हैं जिनसे हर इंसान का साबका सड़क पार करने से लेकर भावी योजना और निवेश तक के तमाम छोटे-बड़े फैसलों तक में पड़ता है। जिस किसी ने भी इन्हें साध लिया, उसकी ज़िंदगी आसान हो जाती है।और भीऔर भी

जब तक नौकरी का दबाव, तब तक अपने काम का समय नहीं। जब नौकरी से मुक्त होकर अपने काम की फुरसत, तब नौकरी की नियमित आय के रुक जाने से उपजी असुरक्षा और घबराहट। मतलब, काम तो दबाव के बीच ही हो सकता है।और भीऔर भी