समय हूं मैं
मैं अजर हूं, अमर हूं, अनंत हूं। तुम मुझे क्या बांटोगे? मैंने खुद को दिन-रात और ऋतुओं में बांटा है। तुमने तो महीने और साल बनाकर मेरा अनुकरण भर किया है। मैं बंटता नहीं, मैं बंधता नहीं। मैं समय हूं।और भीऔर भी
मैं अजर हूं, अमर हूं, अनंत हूं। तुम मुझे क्या बांटोगे? मैंने खुद को दिन-रात और ऋतुओं में बांटा है। तुमने तो महीने और साल बनाकर मेरा अनुकरण भर किया है। मैं बंटता नहीं, मैं बंधता नहीं। मैं समय हूं।और भीऔर भी
समय का अपना चक्र होता है। जो इसे पकड़ नहीं पाते, इसके हिसाब से चल नहीं पाते, वे जीवन की बहुत सारी खुशियों से महरूम रह जाते हैं। देर से सोकर उठनेवाले कभी भी सूर्योदय का आनंद नहीं उठा पाते।और भीऔर भी
न आदि है, न अंत है। वह अनंत है। इस अनंत समय को कैसे नाथा जाए? लेकिन हमने इसे नाथ लिया। समय भले ही अनवरत बहता रहे, लेकिन दिन, महीने, साल में हम उसका हिसाब रखते हैं। नई यात्रा शुरू करते हैं।और भीऔर भी
पैर वर्तमान में और नापते हैं भविष्य को! कैसे संभव है? हम बहकने लगते हैं कि ये होगा तो वो करेंगे, ऐसा होगा तो वैसा करेंगे; जबकि तैयारी यह होनी चाहिए कि ये हुआ तो क्या करेंगे, वो हुआ तो क्या करेंगे।और भीऔर भी
काल से बड़ा कोई नहीं। यमराज भी उनके कहे अनुसार चलते हैं। उगना, खिलना, पकना, मिटना सब काल के खेल हैं। प्राचीन मान्यता है कि स्वर्ग में न बुढ़ापा है और न ही मृत्यु। कठोपनिषद के अनुसार स्वर्ग प्राप्ति का साधन अग्नि-विद्या है। नचिकेता ने यमराज से वही अग्नि रहस्य पूछा था। यमराज ने नचिकेता को अग्नि-विद्या बताई। नचिकेता इस रहस्य को फौरन जान गए। तब से यही अग्नि-विद्या ‘नाचिकेतस अग्नि’ कही जाती है। लेकिन हमारी- आपकीऔरऔर भी
धन चला जाए तो पाया जा सकता है। स्वास्थ्य चला जाए तो दोबारा हासिल किया जा सकता है। यहां तक कि चरित्र भी चला जाए तो उसे सुधारा जा सकता है। लेकिन समय चला जाए तो उसे फिर से पाना असंभव है।और भीऔर भी
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