भारत में शेयर बाज़ार से कमाने की कारगर रणनीति यही है कि ट्रेडर मौका देखे तो निवेशक बन जाए तो निवेशक को ज़रूरत पड़े तो ट्रेडर बन जाए। वैसे, दोनों के बीच बड़ी साफ विभाजन रेखा है। ट्रेडर हमेशा सटोरिया होता है। वह बहुत कम जानकारी जुटाकर अनजाने में छलांग लगाता है। वहीं, निवेशक कतई सटोरिया नहीं होता। वह जितना संभव है, उतना जानकर ही दांव लगाता है। वह जो भी शेयर खरीदे, उसके पीछे निष्पक्ष वऔरऔर भी

चुनावों के माहौल में किन उद्योगों की कंपनियों के स्टॉक्स में ट्रेड करना लाभ का सौदा साबित हो सकता है? उपभोक्ता साजोसामान, टू-ह्वीलर, शराब, इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया और टेक्सटाइल उद्योग। लेकिन फिलहाल बैंकिंग और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों से दूर रहना चाहिए। एक खास बात हमेशा ध्यान में रखें कि इस दौरान बाज़ार बड़ा चंचल या वोलैटाइल हो जाता है तो पोजिशनल या लम्बे ट्रेड से बचना चाहिए। फटाफट सौदे निपटाना ज्यादा सही रहता है। साथ हीऔरऔर भी

अपने यहां चुनाव धन लुटाने का महोत्सव होता है। मतदाताओं से लेकर कार्यकर्ताओं को लुभाने, बहकाने और खींचने के लिए धन पानी की तरह बहाया जाता है। यही वजह है कि चुनावों के बाद उपभोक्ता साजोसामान से लेकर टू-व्हीलर जैसी कंपनियों की भी बिक्री बढ़ जाती है। सत्ताधारी पार्टी की यह भी कोशिश रहती है कि इस दौरान महंगाई न बढ़े। शायद यही वजह है कि इस साल अप्रैल के बाद अब तक पेट्रोल-डीजल के दाम नहींऔरऔर भी

चुनावों में जमकर धन बहता है। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकती, लेकिन माना जाता है कि एफपीआई या एफआईआई के माध्यम से भी इस दौरान राजनीतिक जोड़तोड़ में लगे भारतीय व्यापारियों व उद्योगपतियों का धन बाहर भेजकर वापस लाया जाता है। यूं तो चुनावों में काले-सफेद धन का भेद मिट जाता है। फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस दौरान कालेधन की वैतरिणी ज़ोर-शोर से बहती है। भरपूर विज्ञापन दिखाए और छापे जातेऔरऔर भी

हिमाचल प्रदेश का चुनाव हो गया। गुजरात विधानसभा चुनाव कुछ हफ्तों में होना है। अगले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक व तेलंगाना से लेकर त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम व नगालैंड तक के विधानसभा चुनाव होने हैं। उसके बाद तो 2024 के लोकसभा चुनावों का हंगामा शुरू हो जाएगा। हर सरकार व राजनीतिक दल चुनावी मूड में आ चुके हैं। ओडिशा जैसा राज्य जहां की विधानसभा का चुनाव 2024 में लोकसभा चुनावों के बाद होना है, उसकी भीऔरऔर भी

राजनीति और अर्थनीति का सीधा रिश्ता है क्योंकि राजनीति से ही सरकारें बनती हैं जो आर्थिक नीतियों का फैसला करती हैं जिनसे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से लेकर कॉरपोरेट जगत तक संचालित होता है। कॉरपोरेट जगत पर असर से शेयर बाज़ार सीधा-सीधा प्रभावित होता है। सरकार कौन-सी बनेगी, यह लोकतंत्र के मौजूदा दौर में चुनावों से तय होता है। इस तरह कड़ी से कड़ी जोड़कर देखें तो चुनावों से शेयर बाज़ार का सीधा रिश्ता बनता है। कैसे? यह साबितऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में आप इंडेक्स फंड के ईटीएफ या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीमों के ज़रिए परोक्ष रूप से निवेश कर सकते हैं। लेकिन सीधे निवेश करना है तो संभावनामय कंपनियां चुननी पड़ती हैं, पता करना पड़ता है कि कंपनी का भविष्य क्या हो सकता है। और, आप जानते ही हैं कि कोई भी, यहां तक कि कंपनी का प्रवर्तक भी कंपनी के बारे में सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता। लेकिन बिना भविष्य का अंदाज़ा लगाए किसीऔरऔर भी

भारत में ट्रेडिंग और लम्बे निवेश का सही संतुलन ही शेयर बाज़ार से कमाने का सबसे सुसंगत व कारगर तरीका है। यह कोई बुरी बात नहीं है कि कंपनी का शेयर दो-चार दिन या तीन-चार हफ्ते में न बढ़े तो उसमें की गई ट्रेडिंग को लम्बे समय का निवेश बना लिया जाए और चार-पांच साल के लिए किया गया निवेश अगर कुछ हफ्तों या महीनों में ही लक्ष्य भेद दे तो ट्रेडर की तरह उसे बेचकर मुनाफाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हम-आप जैसे लोगों के लिए लम्बे समय का निवेश एक तरह की ट्रेडिंग है क्योंकि आप वॉरेन बफेट या राकेश झुनझुनवाला की तरह किसी कंपनी का मालिकाना लेने या उसके प्रबंधन में शामिल तो नहीं हो जा रहे। निवेश कुछ साल के बाद बेचेंगे नहीं तो फायदा कैसे होगा! इसलिए लम्बा निवेश भी ट्रेडिंग है। दूसरी तरफ ट्रेडिंग भी छोटे समय का निवेश है। इंट्रा-डे ट्रेडिंग एक दिन के लिए, स्विंग व मोमेंटम ट्रेडिंगऔरऔर भी

कुछ लोग शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से इसलिए घबराते हैं कि इससे होनेवाली आय को बिजनेस आय माना जाएगा और उन्हें ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा। वे यह नहीं समझते कि वे अपनी जेब से नहीं, बल्कि अपनी कमाई पर टैक्स दे रहे हैं। कमाया तभी तो उसका एक हिस्सा टैक्स के रूप में चुकाया। नहीं कमाते तो कहां से टैक्स देते! कहने का सार यह है कि पहले कमाने की सोचें। टैक्स देने के भय से कमानेऔरऔर भी