सेंसेक्स व निफ्टी ऐतिहासिक शिखर पर। सीधा मतलब कि शेयर बाज़ार में लालच चरम पर है। लेकिन खास मतलब टेढ़ा है। चालू वित्त वर्ष 2024-25 के पहले दिन से ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) बेचे जा रहे हैं। उन्होंने कैश सेगमेंट से 1 अप्रैल से 24 मई के बीच स्टॉक एक्सचेंज द्वारा जारी अनंतिम आंकडों के मुताबिक शुद्ध रूप से 70,152 करोड़ रुपए निकाले हैं। बीते हफ्ते उन्होंने 1165.54 करोड़ रुपए की जो शुद्ध खरीद की, वोऔरऔर भी

जो अड़ता है, वो टूट जाता है और जो ढलता है, वही लम्बा चलता है। परिस्थितियां हमेशा एक-सी नहीं होतीं। हमें उनसे निपटने के लिए उनके हिसाब से ढलना पड़ता है। कुदरत का यह नियम शेयर बाज़ार पर ही लागू होता है। बाज़ार के हर चक्र में एक ही रणनीति नहीं चल सकती। इस समय बाज़ार में अनिश्चितता का जो आलम है, उसके हिसाब से हमें अपनी निवेश रणनीति को ढालना होगा। यकीनन, नज़र अल्पकालिक नहीं, बल्किऔरऔर भी

सरकार में बैठे लोग साफ जानते है कि किसे लूटना और किसे छोड़ना है। हालांकि वे व्यापक अवाम के वोटों से चुनकर ही सरकार में आ सकते हैं तो खुद को हमेशा जनता का सबसे बड़ा हितैषी दिखाते रहते हैं। कितनी विचित्र बात है कि देश और जनता की बात करनेवाली मोदी सरकार सबसे ज्यादा धन देश की संस्थाओं और टैक्स जनता से वसूल रही है। रिजर्व बैंक ने 2017-18 से 2022-23 तक के छह साल मेंऔरऔर भी

संघ प्रचारक से भारत के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी का खास गुण है झूठ बोलना और मोदी सरकार का खास अंदाज़ है सच को झुठला देना। जब विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट आई कि दुनिया भर कोरोना महामारी के कुल लगभग 1.5 करोड़ लोम मारे गए, जिसमें से सर्वाधिक एक तिहाई से भी ज्यादा 47 लाख मौतें अकेले भारत में हुई हैं तो मोदी सरकार ने झूठ-झूठ चिल्लाना शुरू कर दिया। हमारा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय 20 मार्चऔरऔर भी

भारत में बढ़ती आर्थिक विषमता पर दस साल से देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी का बयान बेहद उथला और दुखद है। खासकर, तब जब वे और उनका दल भाजपा रामराज्य को अपना आदर्श बताते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है, “राम राज बइठे त्रैलोका, हरषित भए गए सब सोका। बैर न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई।” रामराज्य में आर्थिक ही नहीं, मानसिक विषमता तक की कोई जगह नहींऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही दस साल में देश के 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का दावा करते रहें। लेकिन हकीकत में उनकी नीयत गरीब को गरीब ही बनाए रखने की है। आखिर 81.35 करोड़ लोगों को हर महीने पांच किलो अनाज और 11.8 करोड़ किसानों को हर महीने 500 रुपए की किसान सम्मान निधि देते रहने का क्या तुक है? क्या गरीबों को काम और किसानों को वाजिब दाम नहीं दिया जा सकता?औरऔर भी

वित्त वर्ष 2023-24 की मार्च तिमाही के कॉरपोरेट नतीजे और 18वीं लोकसभा चुनावों का प्रचार अब अंतिम दौर में है। जिस तरह कंपनी प्रबंधन वर्तमान की कमियां छिपाकर भविष्य की संभावनाओं के बड़े-बड़े दावे करता है, उसी तरह राजनीतिक पार्टी का नेता अपनी उपलब्धियों से लेकर भावी योजनाओं के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करता है। कंपनियां प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर विज्ञप्तियों तक निकालती हैं तो राजनीतिक पार्टियां घोषणा-पत्र लाती हैं और नेता आमसभाएं व रैलियां तक करते हैं।औरऔर भी

नरेंद्र मोदी 13 साल गुजरात जैसे औद्योगिक राज्य के मुख्यमंत्री और दस साल भारत जैसी पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता वाले देश के प्रधानमंत्री रहे। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे और प्रचारक ही रह गए। करीब ढाई दशक तक देश के संवैधानिक पदों पर रहने के बावजूद वे हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान की सोच से बाहर नहीं निकल सके। अमित शाह राजनीति में आने से पहले शेयर ब्रोकर थे। लेकिन दस साल गुजरात के गृहमंत्री औरऔरऔर भी

क्या भारत जैसे कृषिप्रधान देश का विकास किसानों के हितों को अनदेखा करके किया जा सकता है? जवाब है कतई नहीं। लेकिन मोदी सरकार ने तो लगता है कि कॉरपोरेट हितों की रक्षा और किसान-हितों की उपेक्षा को अपना शगल बना लिया है। कॉरपोरेट क्षेत्र चाहता है कि सरकार की नीति में निरतंरता व स्थायित्व बना रहे। यकीनन किसान और कृषि उद्यमी भी यही चाहते हैं। लेकिन मोदी सरकार उनकी एक नहीं सुनती। केंद्रीय कृषि मंत्री नेऔरऔर भी

एक समय देश के वित्तीय क्षेत्र में विदेशी फर्मों की भरमार थी। लेकिन अब भारत के बैंकिंग से लेकर म्यूचुअल फंड और बीमा व्यवसाय से वे किनारा कर रही हैं। विदेशी निवेश के नाम पर केवल पोर्टफोलियो निवेशक बचे है जिनके बारे में यही कहना सही होगा कि गंजेड़ी यार किसके, दम लगाकर खिसके। एफपीआई भारतीय शेयर और ऋण बाज़ार में तात्कालिक मुनाफा कमाने आए हैं, उसकी कोई लम्बी प्रतिबद्धता नहीं है। साल भर पहले सिटी ग्रुपऔरऔर भी