शेयर बाज़ार में भले ही फ्रॉड, घोटाले व जालसाज़ी चल जाए, लेकिन यह मूलतः जालसाजी का धंधा नहीं है। यह प्राइस डिस्कवरी या मूल्य की खोज का मंच है जहां सत्य ही चलना चाहिए, इसके अलावा कुछ नहीं। सच कहें तो असत्य पर सत्य की जीत मात्र त्योहारों तक सिमटकर नहीं रह जानी चाहिए। हमें इसे सामाजिक व राष्ट्रीय जीवन के साथ आर्थिक व कारोबारी जीवन में भी अपनाना चाहिए। याद रखें, सत्य ही शाश्वत है, झूठऔरऔर भी

अंग्रेज़ी-हिंदी बिजनेस चैनलों से लेकर पत्र-पत्रिकाओं पर गौर करें तो पाएंगे कि जब शेयर बाज़ार चरम तेज़ी पर होता है, तब वे उसके चढ़ते जाने का माहौल बनाते हैं। ब्रोकरों की तरह चैनलों के एनालिस्ट उन्हीं स्टॉक्स को खरीदने की सलाह देते हैं जो पहले से 52 हफ्ते के शिखर पर हैं। फेसबुक या वॉट्सअप पर तो लोगबाग निफ्टी, बैंक निफ्टी व स्टॉक्स में जादू-मंतर जैसी सलाह फेंकते हैं। तुक्का लग गया तो ऐसे उछलते हैं जैसेऔरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में सक्रिय ज्यादातर आम निवेशक व ट्रेडर इस गफलत में रहते हैं कि बिजनेस अखबार, पत्र-पत्रिकाएं व चैनल उनकी मदद करते हैं और उन्हें देखकर वे अपना भविष्य सुधार सकते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि पूरा का पूरा फाइनेंस व बिजनेस मीडिया कॉरपोरेट क्षेत्र की प्रोपैगैण्डा मशीनरी है। यह फाइनेंस की दुनिया के धंधेबाज़ों को अवाम का शिकार करने में मदद करता है। सरकार भी वित्तीय साक्षरता के नाम पर महज अनुष्ठान पूरा करतीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के चक्रों को जज्ब कर लिया और उसकी दशा-दिशा पकड़ ली तो समझो कि पहला अध्याय पूरा कर लिया। छमाही, तिमाही से लेकर महीने, हफ्ते व दिन तक का चक्र। महीने के पहले हफ्ते में भरपूर जोश व उत्साह रहता है। ट्रेडर पुरानी पोजिशन को बराबर करने के बाद नई पोजिशन शुरू करते हैं। दूसरा हफ्ता शांत रहता है। तीसरे हफ्ते से पोजिशन को रोल या स्क्वायर करना शुरू हो जाता है। डेरिवेटिव सौदों केऔरऔर भी

जीवन में जो चीजें नहीं करनी हों, उनका पता हो (जैसे – हिंसा नहीं करनी, चोरी नहीं करनी, झूठ नहीं बोलना, नशा नहीं करना और व्यभिचार नहीं करना) तो हर तरफ कुशल-मंगल व सुकून रहता है। इसी तरह शेयर बाज़ार में पता हो कि कैसी कंपनियों या स्टॉक्स से बचकर रहना है तो निवेश बड़ा सुखदायी व लाभप्रद होता है। जीवन में ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों को तकलीफ व परेशानी हो और शेयर बाज़ारऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के सफल ट्रेडर को हमेशा प्रवाह के साथ चलना होता है। तभी वह कमाई कर पाता है। अगर कोई ट्रेडर प्रवाह के विपरीत चलने की ‘क्रांतिकारिता’ दिखाता है तो उसकी ट्रेडिंग पूंजी बिना कोई समय गवांए शहीद हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि बाज़ार हमेशा सही होता है और ट्रेडर को उससे फालतू तर्क-वितर्क और बहस नहीं करनी चाहिए। लेकिन लम्बे समय के निवेशक को कतई इस तरह की भेड़चाल का शिकार नहींऔरऔर भी

शेयर बाजार चक्रों में चलता है। इसको ध्यान में रखते हुए ही टेक्निकल एनालिसिस में मूविंग औसत के दिन तय किए जाते हैं। मकसद होता है कि चक्रों के उतार-चढ़ाव को सही तरीके से पकड़ा जाए। गलत हिसाब लगाया तो धोखा। मसलन, एक्पोनेंशियल मूविंग औसत 5, 13 व 20 दिन का लेना चाहिए, जबकि सिम्पल मूविंग औसत 50, 75, 100, 200, 300 व 365 दिनों का कारगर होता है। फिर यह भी ध्यान रखें कि बाज़ार मेंऔरऔर भी

दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में महीने में ज्यादा से ज्यादा 20 दिन ट्रेडिंग होती है। शनिवार-रविवार बंद। इसलिए बाज़ार का स्वाभविक चक्र 20 दिन का होता है। महीने के डेरिवेटिव सौदों की मीयाद इन्हीं 20 दिनों की होती है। सारे ट्रेडरों का खरीदना-बेचना इसी हिसाब से चलता है तो 20 दिन का चक्र बन जाता है। इधर अपने यहां ऑप्शन सौदे सप्ताह में सेटल होने लगे हैं तो महीने के भीतर सप्ताह का भी अलग चक्रऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर चाहे नौकरीपेशा हो या काम-धंधा करता हो, उसके पास महीने के शुरू में धन की गरमी रहती है तो ज्यादा रिस्क ले सकता है। लेकिन महीने का अंत आते-आते सारी गरमी निकल जाती है तो उसकी सक्रियता कम हो जाती है। दरअसल, बाज़ार में सक्रिय इंसानों व संस्थाओं का बर्ताव ही उसमें चक्र का स्वभाव पैदा करता है। वरना, शेयर बाज़ार को कोई सजीव वस्तु तो है नहीं, जिसमें अपने-आप चक्र का चक्कर चल निकले।औरऔर भी

त्योहारी सीज़न के साथ हमारे वित्त वर्ष की दूसरी छमाही का आगाज़ होता है। इस दौरान आर्थिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं तो इसका सीधा असर शेयर बाज़ार पर पड़ता है। लेकिन इस सीज़न को परे रखकर देखें तो भी शेयर बाज़ार कुदरत की ऋतुओं की तरह चक्रों में चलता है। आप कहेंगे कि बाज़ार तो छोटे-बड़े हरेक ट्रेडर की खरीद-बिक्री का योगफल होता है। फिर इसमें कहां से मौसम जैसा चक्र आ गया? दरअसल बाजार का हालऔरऔर भी