आज के दौर में धनलक्ष्मी सभी को चाहिए क्योंकि हर कोई न हर चीज पैदा कर सकता है, न हर सेवा जुटा सकता है। यहां तक कि तथाकथित संतों और बाबाओं ने भी धन की धुनी रमा रखी है। बाबा रामदेव ने देखते ही देखते 3000 करोड़ की नेटवर्थ बना ली है। लेकिन आबादी के हर तबके के पास लक्ष्मी लाने के अलग-अलग तरीके हैं। हर कोई कुछ न कुछ बनाता और बेचता है। भिखारी तक अपनीऔरऔर भी

हर तरफ उजाला हो। जीवन के हर क्षेत्र में पारदर्शिता हो। मन में भी कोई छल-कपट व अंधेरा न हो। किसी को हर जानकारी हो, यह कतई ज़रूरी नहीं। आज के दौर में तो कोई भी जानकारी कभी भी हासिल की जा सकती है। यह भी ध्यान रहे कि इस दुनिया-जहान में सब कुछ हर पल बदल रहा है तो कोई भी जानकारी या सत्य अंतिम नहीं। सदियों पहले जो धन या लक्ष्मी का स्वरूप था, वहऔरऔर भी

हर तरफ उजाला हो। सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों में पारदर्शिता हो। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का आगाज़ हो चुका है। क्या चुनावों के धन में पारदर्शिता है? क्या राजनीति में जवाबदेही है? इन सवालों का शेयर बाज़ार से सीधा तो नहीं, लेकिन घुमा-फिराकर रिश्ता बनता है। राजनीतिक चंदों में जब तक पारदर्शिता नहीं होगी, जब तक वहां कालाधन आता रहेगा, तब तक शेयर बाज़ार में भावों के साथ खेल व धोखा चलता रहेगा और बाज़ारऔरऔर भी

दीपावली पर हम संकल्प लें कि हमें जीवन के हर क्षेत्र में अंधेरे से उजाले की तरफ और अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाना है। इसके लिए पारदर्शिता ज़रूरी है। दिन में सूरज का उजाला और रात में स्ट्रीट लाइट नहीं होगी तो रास्ता कैसे दिखेगा! शेयर बाजार में पूरी पारदर्शिता होनी ही चाहिए। कल को एनएसई और बीएसई आंकड़े छिपाने या गलत आंकड़े देने लग जाएं तो भयंकर घोटाला हो जाएगा और लाखों ट्रेडरों का जीवनऔरऔर भी

दिवाली और दिवाला में बस एक मात्रा का ही अंतर है। लेकिन एक उजाला फैलाती है तो दूसरा बरबाद कर देता है। यह दिवाली या दीपावली का सप्ताह है तो हमें मनन करने की ज़रूरत है कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में 90-95% रिटेल ट्रेडर घाटा क्यों खाते रहते हैं? उत्तर बड़ा साफ है कि वे बुद्धि से कम और भावनाओं से ज्यादा काम लेते हैं। लेकिन यह बात तो सभी जानते हैं कि हमें ट्रेडिंग हीऔरऔर भी

केंद्र सरकार द्वारा रिजर्व बैंक की सचित निधि पर हाथ साफ करना न केवल अनैतिक, बल्कि देश के वित्तीय स्थायित्व के लिए भी घातक है। शुक्र है कि साल 2008 जैसा वैश्विक वित्तीय संकट दोबारा नहीं आया। बिमल जालान समिति ने तय किया था कि 3 जून 2018 तक रिजर्व बैंक के पास मुद्रा व स्वर्ण पुनर्मूल्यांकन रिजर्व खाते में जो 6.91 लाख करोड़ रुपए पड़े हैं, उसे सरकारी पहुंच से दूर रखा जाए तो सरकार लाखऔरऔर भी

उधर ऊर्जित पटेल ने भारतीय रिजर्व बैक के गवर्नर पद से इस्तीफा दिया, इधर सरकार ने दो दिन बाद ही 12 दिसंबर 2018 को वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों के सचिव रह चुके शक्तिकांत दास को गवर्नर बना दिया।  तब तक दास की आर्थिक व वित्तीय मामलों की उतनी ही समझ थी जितनी आईएएस की तैयारी और वित्त मंत्रालय में सेवा देते हुए हासिल की थी। अन्यथा उन्होंने इतिहास व पब्लिक एडिमिनिस्ट्रेशन में ही एमए कर रखाऔरऔर भी

रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से ऊर्जित पटेल का इस्तीफा देना कोई सामान्य घटना नहीं थी। भारत के केंद्रीय बैंक के आठ दशक से ज्यादा के इतिहास में यह पहली घटना थी, जब किसी गवर्नर ने बीच कार्यकाल में इस्तीफा दिया था। उनका तीन साल का कार्यकाल 4 सितंबर 2019 को खत्म होना था। लेकिन उन्होंने इसके नौ महीने ही इस्तीफा दे दिया। पटेल ने मात्र 88 शब्दों के अपने इस्तीफे में इसकी वजह व्यक्तिगत बताई थी।औरऔर भी

वो 6 नवंबर 2106 की तारीख थी, जब भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर पहला हमला हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक रात 8 बजे राष्ट्र के नाम संदेश में ऐलान कर दिया कि रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपए के नोटों की वैधता खत्म की जा रही है। कहा गया कि इससे देश में कालाधन, आतंकवाद व नकली नोटों जैसी तमाम समस्याएं खत्म हो जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मगर, बड़ा अपराध यहऔरऔर भी

शेयर बाज़ार वित्तीय जगत का एक छोटा-सा हिस्सा है। किसी देश के वित्तीय जगत के केंद्र में होता है उसका केंद्रीय बैंक। नोटों के प्रबंधन से लेकर मौद्रिक नीति तक का निर्धारण वही करता है। केंद्रीय बैंक देश के वित्तीय बाज़ार के लिए हृदय का काम करता है। बैंक उसके लिए धमनी तंत्र जैसे हैं। देश की मुद्रा अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी होगी या सस्ती, बाज़ार की इस क्रिया पर भी अंकुश लगाने का अहम काम केंद्रीयऔरऔर भी