नई सीरीज़ में वित्त वर्ष 2025-26 में जीडीपी की विकास दर खींचकर 7.6% कर दी गई। लेकिन अर्थव्यवस्था का आकार छोटा करना पड़ा। एक दिन बाद ही अमेरिका ने ईरान पर हमला बोल दिया। कच्चे तेल के दाम बढ़ते चले गए। डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता गया। भारत दुनिया में जापान व ब्रिटेन से नीचे छठे नंबर पर आ गया। अब पता चला है कि पिछले 12 सालों में आर्थिक विकास का मचाया गया हल्ला असल मेंऔरऔर भी

रिजर्व बैंक के गवर्नर हों, सेबी के चेयरमैन हों या केंद्र सरकार में सचिव स्तर के अधिकारी, सारे के सारे नौकरशाह सरकार के नौकर होते हैं। ये कभी राष्ट्रहित में नहीं, हमेशा सरकार-हित में ही सोचते है। लेकिन पिछले अप्रैल से लेकर इस अप्रैल तक के बारह महीनों में देश पर बारह सालों से राज कर रही मोदी सरकार ने अपने कर्मों से साबित कर दिया है कि वह भले ही देश को विकसित और आर्थिक महाशक्तिऔरऔर भी

सरकार के नीति-नियामकों को दूर-दृष्टि और निकट-दृष्टि, दोनों ही दोष हो गए हैं। उन्हें न नजदीक का कुछ साफ दिख रहा है और न ही थोड़ी दूर का। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बारे में माना जा सकता है कि वे एक राजनीतिक शख्सियत है और उनकी कोई स्वतंत्र दृष्टि नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कहते और सोचते हैं, उनकी गूंज बनना उनकी मजबूरी है। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक तो देश की मौद्रिक नीति का नियंताऔरऔर भी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण देश के कॉरपोरेट क्षेत्र से कह रही हैं कि हमें बताओ कि ज्यादा निवेश करने के लिए आप हमसे क्या चाहते हैं। जब सितंबर 2019 में उन्होंने कॉरपोरेट क्षेत्र को टैक्स में जबरदस्त रियायत देते हुए 1.45 लाख करोड़ रुपए का तोहफा दिया था, तभी से भारतीय उद्योग से क्षमता बढ़ाने और निवेश करने के लिए रिरिया रही हैं। लेकिन उनको नहीं दिख रहा कि जब देश में ग्राहक त्रस्त हों और निर्यातऔरऔर भी

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही नही, देश के अंतःकरण व विवेक का प्रहरी होने ने नाते स्वतंत्र मीडिया को सरकार से पूछना चाहिए था कि पूरे एक साल तक चौथी अर्थव्यवस्था का झूठ क्यों फैलाया गया। प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री और वाणिज्य मंत्री तक से जवाब-तलब किया जाना चाहिए था। लेकिन आईएमएफ का हवाला देकर हमारा मीडिया खिलौना टूट जाने पर बच्चे का मन बहलाने जैसा काम कर रहा है। उसका कहना है कि इस बारऔरऔर भी

डॉलर के मुकाबले रुपए के कमज़ोर होने से भारत अगर दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था न बनकर छठे नंबर पर आ गया तो सवाल यह उठता है जब डॉलर खुद दुनिया की तमाम मुद्राओं के सापेक्ष कमज़ोर हो रहा था, तब हमारा रुपया डॉलर के मुकाबले कमज़ोर क्यों हुआ? ब्रिटिश पाउंड और जापान येन तक डॉलर के मुकाबले मजबूत हुए हैं, जबकि भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के खिलाफ लगातार गिरता जा रहा है। इसकी राजनीतिक व आर्थिक, दोनोंऔरऔर भी

दुनिया में भारत के दो पायदान नीचे गिरकर छठी अर्थव्यवस्था बन जाने पर सरकार के सन्नाटा खींचने का तुक समझ में आता है। वो अप्रिय सच को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती। लेकिन जिस तरह मीडिया का स्वतंत्र व निष्पक्ष कहा जानेवाला हिस्सा भी इस पतन पर एक से एक नायाब बहाने निकालकर सामने लाया है, वो एकदम बेतुका है। लगता है कि वो खुद ही सरकार का अघोषित प्रवक्ता बन गया है। उसका तर्क हैऔरऔर भी

आईएमएफ ने 14 अप्रैल 2025 को जारी वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2025 या हमारे संदर्भ में वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जीडीपी 4.187 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है जो जापान के अनुमानित जीडीपी 4.186 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा ज्यादा होगा। इस तरह भारत तब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। तब हमारे सरकारी तंत्र ने जबरदस्त हल्ला मचाया था। लेकिन इस बार 14 अप्रैल 2026 को आईएमएफऔरऔर भी

पूरे एक साल जनता के बहुमत से चुनी हुई सरकार राष्ट्र के साथ धोखा करती रही, बार-बार सैकड़ों बार झूठ बोलती रही कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। सबसे पहले यह झूठ नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्रमण्यम ने बाकायदा 25 मई 2025 को एक प्रेस कॉन्फेंस में ऐलानिया तौर पर बोला था कि भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। किसी ने उनसे यहऔरऔर भी

दुनिया के तमाम देश जीडीपी की गणना इसलिए करते हैं ताकि विकास की माकूल रणनीति बनाई जा सके। पर मोदी सरकार के नेतृत्व में चल रहा भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है जहां जीडीपी को प्रचार व भौकाल का साधन बना दिया गया है। विकास का सही डेटा देश के नीति-नियामकों और उद्योग-धंधों को ऐसा आधार देता है जिस पर खड़े होकर वे मांग, निवेश की संभावनाओं और मौद्रिक व आर्थिक नीति का समुचित आकलन करऔरऔर भी