इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार हार्वर्ड विश्वविद्यालय की 77 साल की प्रोफेसर क्लाउडिया गोल्डिन को श्रम बाज़ार में महिलाओं की भूमिका की बेहतर समझ विकसित करने के लिए मिला है। पुरस्कार समिति के अध्यक्ष जैकब स्वेनसन का कहना है कि यह समझ समाज के लिए बेहद अहम है और क्लाउडिया गोल्डिन की रिसर्च से हमें उन तमाम कारकों व बाधाओं का गहरा अहसास हुआ है जिन्हें भविष्य में सुलझाने की दरकार है। प्रोफेसर गोल्डिन ने 200औरऔर भी

ब्रोकरों से लेकर शेयर बाज़ार के पंटरों, पण्डों, एनालिस्टों और रेटिंग एजेंसियों तक की फितरत बहती गंगा में हाथ धोने की है। वे ट्रेडरों व निवेशकों को उन्माद से निकालने के बजाय यही संदेश देते हैं कि चढ़ जा बेटा सूली पर, भला करेंगे राम। बढ़े हुए स्टॉक्स में ट्रेड करना रिटेल ट्रेडरों के लिए सुरक्षित रणनीति हो सकती है, लेकिन फूले हुए गुब्बारे में और हवा भरना अच्छा नहीं। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने बैंकिंग क्षेत्र कीऔरऔर भी

अजीब-सा दुष्चक्र है। उधर, बैंक खासकर सरकारी बैंक आम लोगों की बचत से कॉरपोरेट क्षेत्र को दिए गए ऋण राइट-ऑफ करके बट्टेखाते में डाल रहे हैं। इधर आम लोगों को अपना खर्च पूरा करने के लिए जहां-तहां से उधार लेना पड़ रहा है। घटती आमदनी और बचत के बीच उनकी देनदारियां बढ़ती जा रही हैं। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021-22 में देश के आम परिवारों पर कुल 9 लाख करोड़ रुपए का ऋणऔरऔर भी

सरकारी बैंकों ने जितनी भी रिकवरी हो, उसे घटाने के बाद वित्त वर्ष 2017-18 में उन्होंने शुद्ध रूप से 1.18 लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टेखाते में डाले। हालांकि बट्टेखाते में शुद्ध रूप से डाली गई यह रकम घटते-घटते वित्त वर्ष 2021-22 में 0.91 लाख करोड़ रुपए और 2022-23 में 0.84 लाख करोड़ रुपए रह गई। लेकिन इससे बाज़ार में एक तरह का असंतुलन पैदा हो गया। सरकारी बैंकों की होड़ में टिकने के लिए निजी बैकोंऔरऔर भी

हमारे बैंकों ने अप्रैल 2014 से मार्च 2023 तक के नौ सालों में सरकार की सहमति से 14.56 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के डूबत ऋण या एनपीए राइट-ऑफ कर दिए हैं। यह जानकारी खुद केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री भागवत कराड ने लोकसभा में दो महीने पहले 8 अगस्त को दी है। जो 14,56,226 करोड़ रुपए के बैंक ऋण राइट-ऑफ किए गए हैं, उसमें से 7,40,968 करोड़ रुपए यानी 50.88% ऋण बड़ी कंपनियों के हैं। मालूम हो किऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाजार की तेज़ी सारी दुनिया के निवेशकों को खींचे पड़ी है। सभी यहां निवेश करने को लालायित हैं। लेकिन सवाल उठता है कि हमारे बाज़ार की तेज़ी का सत्व क्या है और हवाबाज़ी कितनी है? पहली बात निफ्टी-50 में बैकिंग व वित्तीय सेवाओं का भार सबसे ज्यादा 33.95% है। इस तरह इसका 1/3 से ज्यादा हिस्सा वास्तविक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व नहीं करता, जिसमें मैन्यूफैक्चरिंग से लेकर कृषि, व्यापार व आईटी जैसी अन्य सेवाएं शामिल हैं।औरऔर भी

मार्क मोबियस से लेकर मॉर्गन स्टैनले और नोमुरा सिक्यूरिटीज़ तक ‘इंडिया स्टोरी’ के हरकारे हैं और इसकी मुनादी पीटकर आम भारतीयों की बचत पर हाथ साफ करते हैं। उन्हें पता है कि सच्चाई सामने पर आम भारतीयों को ही अंजाम भुगतना पड़ेगा। इस वक्त असलियत को संगठित व सरकारी स्तर पर छिपाकर कैसे गलत जानकारी दी जा रही है, एक बानगी। चालू वित्त वर्ष 2023-24 की जून तिमाही में जीडीपी की सतह पर दिखनेवाली या नॉमिनल विकासऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हकीकत पर नहीं, बल्कि फिज़ा पर चलता है। खासकर, ट्रेडिंग में तो सदा-सर्वदा हवाबाज़ी ही चलती है। इसीलिए पिछले कुछ सालों से बाज़ार नई से नई चोटी पर पहुंचता जा रहा है। इस माहौल की सरगर्मी बढ़ाकर इफरात धनवाले अपनी दौलत बढ़ाते रहते हैं। दरअसल, शेयर बाज़ार बहुत-बहुत धन रखनेवालों का खेल है जैसे पोलो व इक्वेस्ट्रियन। वे आपस में खेलते हैं। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय का कोई भेद नहीं। एफआईआई हों या डीआईआई, ये केवलऔरऔर भी

मार्क मोबियस उभरते बाज़ारों पर दांव लगानेवाले नामी-गिरामी फंड मैनेजर हैं। उनकी उम्र 87 साल को पार कर चुकी है। वे लगभग 30 करोड़ डॉलर का निवेश संभालते हैं। उनका निवेश भारत, कोरिया, ताइवान, तुर्किए, दक्षिण अफ्रीका व ब्राज़ील तक फैला है। लेकिन सबसे ज्यादा निवेश उन्होंने भारत में कर रखा है तो जाहिरा तौर पर यहां के शेयर बाज़ार में जितनी तेज़ी होगी, मोबियस को उतना ही ज्यादा फायदा होगा। मोबियस कहते हैं कि वे भारतऔरऔर भी

चीनी ज़मीन पर पड़ी हो तो हर तरफ से चीटियों का झुंड उमड़ पड़ता है। इसी तरह जहां ज्यादा रिटर्न की गुंजाइश हो, वहां दुनिया भर के निवेशक टूट पड़ते हैं। लेकिन अपने शेयर बाज़ार में जुलाई के अंतिम हफ्ते से ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) खरीदने से ज्यादा बेचे जा रहे हैं। शेयर बाजार के अनंतिम आंकड़ों के मुताबिक 24 जुलाई से 29 सितंबर तक उन्होंने कैश सेगमेंट से 50,988.69 करोड़ रुपए निकाले हैं। हालांकि एनएसडीएलऔरऔर भी