सरकार में बैठे लोग साफ जानते है कि किसे लूटना और किसे छोड़ना है। हालांकि वे व्यापक अवाम के वोटों से चुनकर ही सरकार में आ सकते हैं तो खुद को हमेशा जनता का सबसे बड़ा हितैषी दिखाते रहते हैं। कितनी विचित्र बात है कि देश और जनता की बात करनेवाली मोदी सरकार सबसे ज्यादा धन देश की संस्थाओं और टैक्स जनता से वसूल रही है। रिजर्व बैंक ने 2017-18 से 2022-23 तक के छह साल मेंऔरऔर भी

संघ प्रचारक से भारत के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी का खास गुण है झूठ बोलना और मोदी सरकार का खास अंदाज़ है सच को झुठला देना। जब विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट आई कि दुनिया भर कोरोना महामारी के कुल लगभग 1.5 करोड़ लोम मारे गए, जिसमें से सर्वाधिक एक तिहाई से भी ज्यादा 47 लाख मौतें अकेले भारत में हुई हैं तो मोदी सरकार ने झूठ-झूठ चिल्लाना शुरू कर दिया। हमारा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय 20 मार्चऔरऔर भी

भारत में बढ़ती आर्थिक विषमता पर दस साल से देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी का बयान बेहद उथला और दुखद है। खासकर, तब जब वे और उनका दल भाजपा रामराज्य को अपना आदर्श बताते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है, “राम राज बइठे त्रैलोका, हरषित भए गए सब सोका। बैर न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई।” रामराज्य में आर्थिक ही नहीं, मानसिक विषमता तक की कोई जगह नहींऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही दस साल में देश के 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का दावा करते रहें। लेकिन हकीकत में उनकी नीयत गरीब को गरीब ही बनाए रखने की है। आखिर 81.35 करोड़ लोगों को हर महीने पांच किलो अनाज और 11.8 करोड़ किसानों को हर महीने 500 रुपए की किसान सम्मान निधि देते रहने का क्या तुक है? क्या गरीबों को काम और किसानों को वाजिब दाम नहीं दिया जा सकता?औरऔर भी

नरेंद्र मोदी 13 साल गुजरात जैसे औद्योगिक राज्य के मुख्यमंत्री और दस साल भारत जैसी पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता वाले देश के प्रधानमंत्री रहे। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे और प्रचारक ही रह गए। करीब ढाई दशक तक देश के संवैधानिक पदों पर रहने के बावजूद वे हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान की सोच से बाहर नहीं निकल सके। अमित शाह राजनीति में आने से पहले शेयर ब्रोकर थे। लेकिन दस साल गुजरात के गृहमंत्री औरऔरऔर भी

क्या भारत जैसे कृषिप्रधान देश का विकास किसानों के हितों को अनदेखा करके किया जा सकता है? जवाब है कतई नहीं। लेकिन मोदी सरकार ने तो लगता है कि कॉरपोरेट हितों की रक्षा और किसान-हितों की उपेक्षा को अपना शगल बना लिया है। कॉरपोरेट क्षेत्र चाहता है कि सरकार की नीति में निरतंरता व स्थायित्व बना रहे। यकीनन किसान और कृषि उद्यमी भी यही चाहते हैं। लेकिन मोदी सरकार उनकी एक नहीं सुनती। केंद्रीय कृषि मंत्री नेऔरऔर भी

एक समय देश के वित्तीय क्षेत्र में विदेशी फर्मों की भरमार थी। लेकिन अब भारत के बैंकिंग से लेकर म्यूचुअल फंड और बीमा व्यवसाय से वे किनारा कर रही हैं। विदेशी निवेश के नाम पर केवल पोर्टफोलियो निवेशक बचे है जिनके बारे में यही कहना सही होगा कि गंजेड़ी यार किसके, दम लगाकर खिसके। एफपीआई भारतीय शेयर और ऋण बाज़ार में तात्कालिक मुनाफा कमाने आए हैं, उसकी कोई लम्बी प्रतिबद्धता नहीं है। साल भर पहले सिटी ग्रुपऔरऔर भी

एक तरफ भारतीय अर्थव्यवस्था की कमज़ोरियां दुनिया के सामने खुलती जा रही है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मूर्खताएं भी जमकर जगजाहिर होने लगी हैं। देश ही नहीं, बाहर भी उनकी जगहंसाई हो रही है। इससे उनसे कहीं ज्यादा भारत की छवि सारी दुनिया में खराब हो रही है। कुछ दिन पहले उन्होंने ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक पर तंज कसते हुए कहा कि वे अपने राज्य के जिलों की राजधानियों का नाम नहीं बता सकते।औरऔर भी

हम भले ही प्रचार से उपजी धारणाओं से बंधकर स्वीकार न करें कि हमारी अर्थव्यवस्था की चमक फीकी पड़ रही है। लेकिन यह एक ऐसी हकीकत है जिसे अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वियतनाम जैसा छोटा-सा देश हमें निर्यात के मोर्चे पर मात दे रहा है। वियतनाम की आबादी भारत की मात्र 7% है और वहां का जीडीपी भारत का 12% ही है। फिर भी वहां का वस्तु या माल निर्यात भारत के नॉन-ऑयल निर्यात केऔरऔर भी

मोदीराज में अर्थव्यवस्था पर चढ़ाई गई झूठ की कलई अब उतरने लगी है। केंद्र सरकार के झोंको-झोंक पूंजीगत खर्च और पीएलआई जैसे सब्सिडी प्रोत्साहन व कॉरपोरेट टैक्स में रियायत के बावजूद निजी क्षेत्र ठंडा पड़ा है क्योंकि देश के भीतर मांग नहीं बढ़ रही है, जबकि बाहर मंदी जैसे हालात हैं। इसलिए वो पूंजी निवेश नहीं बढ़ा रहा। इसे दर्शानेवाले सकल स्थाई पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) का आंकड़ा बढ़कर भी जीडीपी के 31% तक पहुंचा है जो मनमोहनऔरऔर भी