बचत आमजन की, खेला चला बैंकों का

सरकारी बैंकों ने जितनी भी रिकवरी हो, उसे घटाने के बाद वित्त वर्ष 2017-18 में उन्होंने शुद्ध रूप से 1.18 लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टेखाते में डाले। हालांकि बट्टेखाते में शुद्ध रूप से डाली गई यह रकम घटते-घटते वित्त वर्ष 2021-22 में 0.91 लाख करोड़ रुपए और 2022-23 में 0.84 लाख करोड़ रुपए रह गई। लेकिन इससे बाज़ार में एक तरह का असंतुलन पैदा हो गया। सरकारी बैंकों की होड़ में टिकने के लिए निजी बैकों को भी वित्त वर्ष 2022-23 में 73,803 करोड़ रुपए के ऋण बट्टेखाते में डालने पड़े। फिर भी पिछले तीन सालों में बट्टेखाते में डाले गए 5.87 लाख करोड़ रुपए के ऋणों में से 62.35% या 3.66 लाख करोड़ रुपए के ऋण सरकारी बैंकों के थे। अकेले वित्त वर्ष 2022-23 में भारतीय स्टेट बैंक ने 24,061 करोड़ रुपए, पंजाब नेशनल बैंक ने 16,578 करोड़ रुपए, यूनियन बैंक ने 19,175 करोड़ रुपए, बैंक ऑफ बड़ौदा ने 17,998 करोड़ रुपए और सेंट्रल बैंक ने 10,258 करोड़ रुपए के ऋण राइट-ऑफ किए हैं। इससे न केवल इन्हें कम प्रावधान करने से उनका लाभ बढ़ गया, बल्कि उनकी करदेयता भी कम हो गई तो शेयर चमचमा गए। लेकिन सरकार या रिजर्व बैंक की तरह बैंक नोट नहीं छापते। उनकी सारी पूंजी आमजन से आती है। आमजन पर इसका क्या असर पड़ा? अब बुधवार की बुद्धि…

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