ठीक चुनावों के पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए सरकार किस कदर नोट बहाने जा रही है, यह हकीकत इस साल के बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और दिसंबर तक के वास्तविक खर्च पर नज़र डालने से खुल जाती है। मसलन, चालू वित्त वर्ष 2023-24 के लिए ग्रामीण विकास विभाग के खर्च का बजट अनुमान ₹1,57,545 करोड़ और संशोधित अनुमान ₹1,71,069 करोड़ है, जबकि कंट्रोलर जनरल ऑफ एकाउंट्स (सीजीए) के मुताबिक दिसंबर 2023 तक वास्तविक खर्च ₹1,07,912 करोड़औरऔर भी

तिलिस्म इतना घना है कि कई निष्पक्ष अखबार तक अभिभूत हैं कि भले ही यह अंतरिम बजट चुनावों के बाद पूरा बजट पेश करने तक के रूटीन खर्च के लिए लेखानुदान था। फिर भी मोदी सरकार ने राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए किसी लोकलुभावन उपाय की ज़रूरत नहीं समझी और चुनावी हित के बजाय ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र का पालन किया। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने इसे देश के भविष्य निर्माण का बजट बताया और कहाऔरऔर भी

इस बार के अंतरिम बजट में शब्दों, वादों व दावों के नीचे जाएं तो आपको झूठ, धोखा, फरेब व छद्म ही नज़र आता है। पिछले साल के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि लगातार तीसरे साल पूंजीगत व्यय 33% बढ़ाकर ₹10 लाख करोड़ किया जा रहा है। इस साल उन्होंने कहा कि इसे नए वित्त वर्ष में 11.1% बढ़ाकर ₹11,11,111 करोड़ किया जा रहा है। लेकिन यह नहीं बताया कि चालू वित्त वर्षऔरऔर भी

जब बड़े-बड़े अर्थशास्त्री से लेकर रेटिंग एजेंसियां तक कह रही थीं कि चालू वित्त वर्ष 2023-24 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.9% तक सीमित रखने का लक्ष्य नहीं पूरा हो सकता, तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे 5.8% तक सिमटाने का कमाल दिखा दिया। यही नहीं, जब कहा जा रहा था कि अगले वित्त वर्ष 2024-25 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 5.3% रखा जा सकता है, तब वित्त मंत्री ने इसे 5.1% परऔरऔर भी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज 11 बजे लोकसभा में नए वित्त वर्ष 2024-25 का अंतरिम बजट पेश कर रही हैं। यह उनका छठा बजट है। इसमें कितना सच, कितना झूठ होता है, इसका खुलासा नीति आयोग के सीईओ बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम ने पिछले साल जुलाई में सेंटर फॉर सोशल एंड इकनॉमिक प्रोग्रेस (सीएसईपी) द्वारा आयोजित एक वार्ता में किया था। सुब्रह्मण्यम तब नीति आयोग के सीईओ बनाए जा चुके थे। उन्होंने बड़े ही बेबाक अंदाज़ में कहा थाऔरऔर भी

जमकर टैक्स और टैक्स से भिन्न राजस्व पाने के बावजूद केंद्र सरकार इस बार वित्तीय अनुशासन की लक्ष्मण रेखा से बाहर निकल जाएगी। चालू वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में अनुमान लगाया था कि राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.9% तक सीमित रखा जाएगा। अगर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आंकड़ों की कोई हेराफेरी नहीं की तो यह घाटा जीडीपी के 6% के पार जा सकता है। यह 5.9% की बजट प्रतिबद्धता को तभी मान सकता है,औरऔर भी

बजट पेश करने से पहले वित्त मंत्री बड़ी खुश होंगी क्योंकि सरकार के खजाने में जमकर टैक्स आ रहा है। असल में यह नौ साल से चल रही इस सरकार की इकलौती सबसे बड़ी कामयाबी है। बाकी सब महज झांकी है, दिखावा है। 10 जनवरी तक रिफंड को घटाकर सरकार के पास 14.7 लाख करोड़ रुपए का प्रत्यक्ष टैक्स आ चुका था। यह साल भर पहले से 19.41% ज्यादा है और पूरे चालू वित्त वर्ष के लक्ष्यऔरऔर भी

इस हफ्ते गुरुवार, 1 फरवरी को सरकार नए वित्त वर्ष 2024-25 का अंतरिम बजट पेश करने जा रही है। चुनाव के ठीक पहले का बजट किसी आम बजट से भी ज्यादा अहम हो सकता है क्योंकि तब सरकार अवाम को थोड़ा ज्यादा याद रखती है। टैक्स नहीं लगा सकती। हालांकि गरीब नवाज़ होने का हल्ला खूब मचाएगी। मीडिया अगले चार-पांच दिन तक बजट को लेकर पगलाया रहेगा। वो क्या कहेगा, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकताऔरऔर भी

गणतंत्र, संविधानप्रदत्त अधिकारों से सम्पन्न नागरिकों का देश। अंग्रेज़ों द्वारा गुलामी के दौरान मॉरीशस लेकर सूरीनाम और दूसरे देशों में बसाए भारतीय वापस लौटकर नहीं आए तो बात समझ में आती है। खाड़ी के देशों में गए कामगार वापस मुल्क नहीं लौट रहे तो वजह साफ है। लेकिन आज जिस तरह गरीब व बेरोज़गार नौजवान ठगों और बिचौलियों का शिकार बनकर भी विदेश जाने को लालायित हैं, प्रोफेशनल अपनी बिकाऊ प्रतिभा के दम पर वर्क वीज़ा हासिलऔरऔर भी

पिछले एक दशक में देश छोड़कर बाहर भाग रहे गरीबों, नौजवानों, प्रोफेशनल्स और अमीरों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है। खुद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में 21 जुलाई 2023 को बताया था कि 2022 में कुल 2,25,260 भारतीयों ने अपनी भारतीय नागरिकता छोड़ी है। 2020 में यह संख्या 85,256 थी। दो साल में ढाई गुना से ज्यादा! वित्त वर्ष 2011-12 से लेकर 2022-23 तक कुल 16,63,440 भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ी है। बीते सालऔरऔर भी