शिखर सम्मेलन की समाप्ति के साथ भारत से जी-20 की रौनक उतरने लगी है। अब उसके नेतृत्व की सफलता के मूल्यांकन का दौर चल रहा है। हालांकि भारत की अध्यक्षता का कार्यकाल अभी 30 नवंबर तक चलेगा। बड़ी सफलता यह है कि सम्मेलन के पहले ही दिन संयुक्त दिल्ली घोषणा पर सर्वसम्मति बन गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बोला – मैं जी-20 देशों के नेताओं के डिक्लेरेशन को अपनाने का प्रस्ताव रखता हूं। फिर अगली ही सांसऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का उनका नारा विश्व कल्याण के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बन सकता है। लेकिन भारत की ज़मीनी हकीकत से वाकिफ कोई भी व्यक्ति सवाल उठा सकता है – किसका साथ, किसका विकास? पिछल नौ सालों में देश में आर्थिक व सामाजिक स्तर पर विषमता व वैमनस्य बढ़ता गया है। आबादी का निचला 50% राष्ट्रीय आय का मात्र 13% हासिल करता है। उसके पास देश की दौलत काऔरऔर भी

दिल्ली के प्रगति मैदान के जिस भारत मंडपम में जी-20 का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है, उसे आधुनिकता व समावेशी राष्ट्र के प्रतीक हॉल ऑफ नेशंस की भव्य इमारत को ढहाकर बनाया गया है। मशहूर आर्किटेक्ट राज रेवाल और स्ट्रक्चरल इंजीनियर महेंद्र राज ने इसे अपनी संपूर्ण मेधा का इस्तेमाल करते हुए आज़ादी की 25वीं वर्षगांठ पर साल 1972 में बनाया था। उन्होंने आधुनिक ज्यामितीय स्पष्टता बरतते हुए इसे भारत के आत्मनिर्भर होते जाने के प्रतीकऔरऔर भी

जी-20 का शिखर सम्मेलन नजदीक आने के साथ ही शब्दों का खोखलापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर पर चढ़कर बोलने लगा है। एक तरफ वे जीडीपी के दम पर कहते नहीं थकते कि भारत एक दशक से भी कम समय में दसवीं से छलाग लगाकर दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। दूसरी तरफ उनका बयान है कि दुनिया का जीडीपी केंद्रित दृष्टिकोण अब मानव-केंद्रित में बदल रहा है। अगर ऐसा है तो वे एक बार भीऔरऔर भी

दुनिया के 19 देशों और यूरोपीय संघ के समूह जी-20 का गठन सितंबर 1999 में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व वित्तीय मुद्दों पर वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैकों के गर्वनरों की चर्चा के लिए किया गया था। तभी से हर साल इस समूह की रूटीन बैठक होती रही है। साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सालाना बैठक में राष्ट्र प्रमुखों को शामिल किया जाने लगा। भारत इससे पहले साल 2003 में जी-20 की अध्यक्षता कर चुका है।औरऔर भी

यह हफ्ता जी-20 के नाम। इस सप्ताहांत शनिवार-रविवार को दुनिया की तकरीबन दो-तिहाई आबादी, 75% वैश्विक व्यापार और 85% वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करनेवाले शीर्ष नीति-नियामक राजधानी दिल्ली में जमा हो रहे हैं और साझा सरोकारों पर समाधान निकालने की कोशिश करेंगे। जी-20 में यूरोपीय संघ और दुनिया के 19 अन्य देश शामिल है। ये देश हैं अमेरिका, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, ब्रिटेन, भारत, कनाडा, चीन, जर्मनी, फ्रांस, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिणऔरऔर भी

आंकड़े गवाह हैं कि पिछले सात साल में सड़क पर आ गए नौजवानों की संख्या लगातार बढ़ती गई है। इसी का एक हिस्सा दंगाई या उन्मादी भीड़ बन जा रहा है। ऊपर से कोई राजनीतिक संगठन इन्हें दिन के 200-250 से लेकर 500 रुपए दे दे तो करैला नीम चढ़ा की स्थिति बन जाती है। लेकिन यह देश के आर्थिक विकास के लिए बेहद घातक स्थिति है। यह हमारी युवा शक्ति को, हमारी डेमोग्राफी की ताकत कोऔरऔर भी

यह बेहद खतरनाक ट्रेंड है कि देश में रोजगार-प्राप्त लोगों में नौजवानों का हिस्सा घट रहा है और 60 साल के करीब पहुंच रहे लोगों का हिस्सा बढ़ रहा है। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक देश में वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 15 से 29 साल तक की 35.49 करोड़ की आबादी में से 10.34 करोड़ या करीब 29% को रोज़गार मिला हुआ था। 2022-23 में ऐसे युवाओं की आबादी 38.13 करोड़ हो गई, जिसमें से 7.10औरऔर भी

एक तरफ प्रधानमंत्री देश के नौजवान बेटी-बेटियों के सौभाग्य की बात कर रहें हैं, दूसरी तरफ दुर्भाग्य की बात यह है कि पिछले सात सालों में देश की श्रम-शक्ति तेज़ी से बूढ़ी होती जा रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों की थाह लेने पर पता चलता है कि वित्त वर्ष 2016-17 के शुरू से 2022-23 के अंत तक देश की काम-धंधे में लगी आबादी में 15 से 29 साल तक के युवाओं काऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से बोले, “आज मेरे देश के नौजवानों को, मेरे देश की बेटे-बेटियों को जो सौभाग्‍य मिला है, ऐसा सौभाग्‍य शायद ही किसी को नसीब होता है। इसलिए हमें इसे गंवाना नहीं है। युवा शक्ति में मेरा भरोसा है, युवा शक्ति में सामर्थ्‍य है और हमारी नीतियां और हमारी रीतियां भी उस युवा सामर्थ्‍य को और बल देने के लिए हैं।” क्या सचमुच ऐसा है? सरकार की जो नीतियांऔरऔर भी