शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग लालच व भय की आदिम भावनाओं का खेल है। इसका नियंत्रण हमारे शरीर मे भीतर ही भीतर रिसने वाला एक हॉर्मोन एड्रेनालाइन करता है। इसे ‘फाइट-ऑर-फ्लाइट हॉर्मोन’ के रूप में भी जाना जाता है। इसका स्राव शरीर में तनावपूर्ण, रोमांचक, खतरनाक या खतरे की स्थिति के जवाब में खुद-ब-खुद होने लगता है। यह प्रकृति की बनाई व्यवस्था है। एड्रेनालाइन हमारे शरीर को अधिक तेज़ी से प्रतिक्रिया करने में मदद करता है। असल मेंऔरऔर भी

देशी-विदेशी संस्थाएं औरों का धन ही शेयर बाज़ार में लगाकर मैनेज करती है। लेकिन लाख टके का सवाल है कि दूसरे के धन को मैनेज करने का यह काम दरअसल होता क्या है? इसमें काम यह नहीं होता कि दुनिया कैसे काम करती है, युद्ध छिड़ा है या शांति है, यहां तक कि अर्थव्यवस्था कैसे काम कर रही है, इससे भी इसका कोई मतलब नहीं होता। यहां तो बस उन स्टॉक्स को पकड़ना होता है जो दूसरेऔरऔर भी

म्यूचुअल फंड से लेकर बैंक, बीमा कंपनियां और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) तक अपने धन पर नहीं, दूसरों के धन पर धंधा करते हैं। दूसरों को जब तक ज्यादा कमाकर देते हैं, तब तक वे उनके साथ बने रहते हैं। नहीं तो छोड़कर कहीं और चले जाते हैं। सभी देशी-विदेशी निवेशक संस्थाएं सिस्टम बनाकर चलती हैं और अमूमन उनका धंधा बराबर बढ़ता ही रहता है। कमाल की बात यह है कि बाज़ार गिरता है, तब भी उनकेऔरऔर भी

अपने यहां महिलाओं का बहुत बड़ा हिस्सा घर-परिवार चलाने के बेहद ज़रूरी काम में रात-दिन लगा रहता है। लेकिन उन्हें इसका कहीं से कोई भुगतान नहीं मिलता तो इन महिलाओं की गिनती देश की श्रम शक्ति में नहीं होती। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एक नए अध्ययन में हिसाब लगाया गया है कि अगर महिलाओं को इस अनपेड काम का भुगतान मिलने लग जाए तो इससे हमारे जीडीपी या अर्थव्यवस्था में लगभग 7.5% का इज़ाफा हो जाएगा।औरऔर भी

सरकार का सर्वेक्षण कहता है कि बीते वित्त वर्ष 2022-23 में देश में 15 साल के ऊपर के सभी भारतीयों की श्रम बल या बाज़ार में भागादारी 54.6% है जिसमें से महिलाएं 31.6% हैं। वहीं, प्रोफेशनल संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) का कहना है कि श्रम बाजार में यह भागीदारी 2022-23 में मात्र 39.5% रही है जो 2016-17 के बाद का न्यूनतम स्तर है। इसमें भी केवल पुरुषों का हिस्सा 66% है, जबकि महिलाओं काऔरऔर भी

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः से लेकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम तक भारत में महिला शक्ति का बड़ा हल्ला है। लेकिन जिस देश में प्रधानमंत्री तक महिला हुई है, अभी वित्त मंत्री और राष्ट्रपति तक महिला हैं, क्या वहां महिलाएं सशक्त हुई हैं और श्रम बाज़ार में उनकी मजबूत भागीदारी है? भारत दुनिया के उन मुठ्ठी भर देशों में शुमार हैं जहां श्रम बाज़ार में महिलाओं की भागीदारी भयंकर गति से घटी है। इस पतन मेंऔरऔर भी

क्लाउडिया गोल्डिन ने अमेरिका ही नहीं, दुनिया के सौ से ज्यादा देशों के डेटा के गहन विश्लेषण से ऐसे तथ्य निकाले हैं जिन्होंने महिलाओं की श्रम भागीदारी के बारे में सदियों से चले आ रहे मिथकों को तोड़ दिया। माना जाता था कि आर्थिक विकास व औद्योगिकीकरण से श्रम बाज़ार में महिलाओं का आना बढ़ता जाएगा। गोल्डिन ने बताया कि हकीकत यह है कि 19वीं सदी में औद्योगिकीकरण से पहले महिलाएं बाहर ज्यादा काम करती थीं। लेकिनऔरऔर भी

इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार हार्वर्ड विश्वविद्यालय की 77 साल की प्रोफेसर क्लाउडिया गोल्डिन को श्रम बाज़ार में महिलाओं की भूमिका की बेहतर समझ विकसित करने के लिए मिला है। पुरस्कार समिति के अध्यक्ष जैकब स्वेनसन का कहना है कि यह समझ समाज के लिए बेहद अहम है और क्लाउडिया गोल्डिन की रिसर्च से हमें उन तमाम कारकों व बाधाओं का गहरा अहसास हुआ है जिन्हें भविष्य में सुलझाने की दरकार है। प्रोफेसर गोल्डिन ने 200औरऔर भी

ब्रोकरों से लेकर शेयर बाज़ार के पंटरों, पण्डों, एनालिस्टों और रेटिंग एजेंसियों तक की फितरत बहती गंगा में हाथ धोने की है। वे ट्रेडरों व निवेशकों को उन्माद से निकालने के बजाय यही संदेश देते हैं कि चढ़ जा बेटा सूली पर, भला करेंगे राम। बढ़े हुए स्टॉक्स में ट्रेड करना रिटेल ट्रेडरों के लिए सुरक्षित रणनीति हो सकती है, लेकिन फूले हुए गुब्बारे में और हवा भरना अच्छा नहीं। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने बैंकिंग क्षेत्र कीऔरऔर भी

अजीब-सा दुष्चक्र है। उधर, बैंक खासकर सरकारी बैंक आम लोगों की बचत से कॉरपोरेट क्षेत्र को दिए गए ऋण राइट-ऑफ करके बट्टेखाते में डाल रहे हैं। इधर आम लोगों को अपना खर्च पूरा करने के लिए जहां-तहां से उधार लेना पड़ रहा है। घटती आमदनी और बचत के बीच उनकी देनदारियां बढ़ती जा रही हैं। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021-22 में देश के आम परिवारों पर कुल 9 लाख करोड़ रुपए का ऋणऔरऔर भी