हर कोई बेहतरीन खाना नहीं बना सकता, लेकिन अच्छे खाने की तारीफ तो हर कोई कर सकता है। इसी तरह हर कोई अच्छा बिजनेस नहीं चला सकता। लेकिन कौन-सा बिजनेस अच्छा है, कहां मार्जिन ज्यादा है, संभावना अधिक है, यह बात दिमाग पर थोड़ा-सा ज़ोर लगाकर कोई भी समझ सकता है। शेयर बाज़ार में निवेश करना है तो यही समझना पड़ता है। हम बस इतना कर लें तो बाकी काम कंपनी कर डालेगी। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

ठीक तीन साल पहले 5 अक्टूबर 2011 हमने डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज़ में निवेश की सलाह दी थी। तब उसका पांच रुपए अंकित मूल्य का शेयर 1450 रुपए पर था। पांच रुपए का वही शेयर अभी 3210 रुपए पर चल रहा है। तीन साल में निवेश का 2.21 गुना हो जाना चमत्कार नहीं। यह है बढ़ती कंपनी के साथ आपके स्वामित्व के मूल्य का बढ़ते जाना। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी जहां उड़ेगा आपका निवेश पंख लगाकर…औरऔर भी

बाज़ार है तभी मूल्य मिलता और दौलत बनती है। समृद्धि पैदा करने और उसका आधार फैलाने में बाज़ार का कोई दूसरा जोड़ीदार नहीं। जो लोग बाज़ार को गाली देते हैं वे असल में समाजवाद के नाम पर जाने-अनजाने सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। गांठ बांध लें कि भारत अभी जिस मुकाम पर है, वहां मोदी हों या न हों, अर्थव्यवस्था का जबरदस्त विकास होना है और बढेंगी अच्छी कंपनियां। इन्हीं की शिनाख्त करते हैं हम…औरऔर भी

याद रखें कि शेयर बाज़ार अपने-आप में कुछ नहीं। वो अंततः अर्थव्यवस्था की छाया है। हमारी अर्थव्यवस्था अभी उस मुकाम है जहां से उसकी अनंत संभावनाएं खुलने जा रही हैं। मंथन चल रहा है। तलहटी में पड़े मुद्दे उभर कर सामने आ रहे हैं। पूरा देश समाधान खोजने में लगा है। विदेश गई प्रतिभाएं वापस आती जा रही हैं। अब भविष्य किसी सरकार का मोहताज नहीं। ऐसे में तथास्तु लगा है अच्छी कंपनियां चुनकर सामने लाने में…औरऔर भी

सच है कि खेती में बरक्कत नहीं। नौकरी में भी बरक्कत नहीं, बस गुजारा चल जाता है। दलाल ही हर तरफ चहकते दिखते हैं। पर यह आंशिक सच है। इसी समाज में नारायणमूर्ति जैसे लोग भी हैं। इनफोसिस के शेयरों की बदौलत उनका ड्राइवर भी चंद सालों में करोड़पति बन गया। हमें धंधे में बरक्कत करनेवाली ऐसी कंपनियां ही चुननी होंगी। इनमें निजी कंपनियां भी हैं और सरकारी भी। आज तथास्तु में ऐसी ही एक सरकारी कंपनी…औरऔर भी

जिस तरह एफडी करने का कोई नियत साल नहीं होता, सोना या ज़मीन खरीदने का कोई बंधा-बंधाया समय नहीं होता, वैसे ही शेयर बाज़ार में निवेश करने का पक्का समय नहीं होता। अतिरिक्त धन हुआ तो लगा दिया और ज़रूरत पड़ी तो निकाल लिया। दूसरे माध्यमों की तरह यह भी निवेश का एक माध्यम है। फर्क बस इतना है कि मुद्रास्फीति को मात देने की समयसिद्ध क्षमता अच्छी कंपनियों में ही होती है। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

थोड़ा-सा धैर्य और थोड़ी-सी समझ हो तो शेयर बाज़ार में निवेश से कमाई कतई मुश्किल नहीं। हमने यहीं पर इसी साल 26 जनवरी को एसबीआई को तीन साल में 2900 तक पहुंचने के लक्ष्य के साथ 1615 पर खरीदने की सिफारिश की थी। यह शेयर 14 फरवरी को 1455 तक गिर गया। लेकिन 26 मई को 2835 तक उठ गया। चार महीने में 75.54% का रिटर्न! सुचितिंत रणनीति हमेशा फायदा कराती है। आज फिर एक लार्जकैप कंपनी…औरऔर भी

ऐसा क्यों कि कंपनी गर्त में जा रही होती है और उसके प्रवर्तकों की मौज बढ़ती रहती है? सुज़लॉन एनर्जी की वित्तीय हालत और उसके शेयर की दुर्गति आप जानते होंगे। छह साल में शेयर 446 से 9.70 रुपए पर आ चुका है। लेकिन उसके प्रवर्तक तुलसी तांती ने अपनी सालाना तनख्वाह दो करोड़ से बढ़ाकर सीधे तीन करोड़ कर ली! हमें ऐसे प्रवर्तकों की कंपनियों से दूर रहना चाहिए। अब तथास्तु में आज एक लार्जकैप कंपनी…औरऔर भी

शेयरों में निवेश से जो लोग पैसा बनाते हैं और जो नहीं बना पाते, उनमें सबसे बड़ा अंतर यह नहीं कि पहला हर वक्त सही शेयरों को चुनता है और दूसरा नहीं। अंतर पड़ता है इससे कि आप अपना निवेश विभिन्न स्तर की कंपनियों में कैसे बांटते हैं। समयसिद्ध नियम है कि निवेशयोग्य धन का 50-60% लार्जकैप, 25-30% मिडकैप और 5-10% स्मॉलकैप स्टॉक्स में लगाएं तो घाटे में कभी नहीं रहेंगे। आज तथास्तु में एक स्मॉलकैप स्टॉक…औरऔर भी