लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही नही, देश के अंतःकरण व विवेक का प्रहरी होने ने नाते स्वतंत्र मीडिया को सरकार से पूछना चाहिए था कि पूरे एक साल तक चौथी अर्थव्यवस्था का झूठ क्यों फैलाया गया। प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री और वाणिज्य मंत्री तक से जवाब-तलब किया जाना चाहिए था। लेकिन आईएमएफ का हवाला देकर हमारा मीडिया खिलौना टूट जाने पर बच्चे का मन बहलाने जैसा काम कर रहा है। उसका कहना है कि इस बारऔरऔर भी

डॉलर के मुकाबले रुपए के कमज़ोर होने से भारत अगर दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था न बनकर छठे नंबर पर आ गया तो सवाल यह उठता है जब डॉलर खुद दुनिया की तमाम मुद्राओं के सापेक्ष कमज़ोर हो रहा था, तब हमारा रुपया डॉलर के मुकाबले कमज़ोर क्यों हुआ? ब्रिटिश पाउंड और जापान येन तक डॉलर के मुकाबले मजबूत हुए हैं, जबकि भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के खिलाफ लगातार गिरता जा रहा है। इसकी राजनीतिक व आर्थिक, दोनोंऔरऔर भी

दुनिया में भारत के दो पायदान नीचे गिरकर छठी अर्थव्यवस्था बन जाने पर सरकार के सन्नाटा खींचने का तुक समझ में आता है। वो अप्रिय सच को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती। लेकिन जिस तरह मीडिया का स्वतंत्र व निष्पक्ष कहा जानेवाला हिस्सा भी इस पतन पर एक से एक नायाब बहाने निकालकर सामने लाया है, वो एकदम बेतुका है। लगता है कि वो खुद ही सरकार का अघोषित प्रवक्ता बन गया है। उसका तर्क हैऔरऔर भी

आईएमएफ ने 14 अप्रैल 2025 को जारी वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2025 या हमारे संदर्भ में वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जीडीपी 4.187 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है जो जापान के अनुमानित जीडीपी 4.186 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा ज्यादा होगा। इस तरह भारत तब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। तब हमारे सरकारी तंत्र ने जबरदस्त हल्ला मचाया था। लेकिन इस बार 14 अप्रैल 2026 को आईएमएफऔरऔर भी

पूरे एक साल जनता के बहुमत से चुनी हुई सरकार राष्ट्र के साथ धोखा करती रही, बार-बार सैकड़ों बार झूठ बोलती रही कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। सबसे पहले यह झूठ नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्रमण्यम ने बाकायदा 25 मई 2025 को एक प्रेस कॉन्फेंस में ऐलानिया तौर पर बोला था कि भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। किसी ने उनसे यहऔरऔर भी

दुनिया के तमाम देश जीडीपी की गणना इसलिए करते हैं ताकि विकास की माकूल रणनीति बनाई जा सके। पर मोदी सरकार के नेतृत्व में चल रहा भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है जहां जीडीपी को प्रचार व भौकाल का साधन बना दिया गया है। विकास का सही डेटा देश के नीति-नियामकों और उद्योग-धंधों को ऐसा आधार देता है जिस पर खड़े होकर वे मांग, निवेश की संभावनाओं और मौद्रिक व आर्थिक नीति का समुचित आकलन करऔरऔर भी

सच्चाई कभी धारणाओं में बंधकर नहीं चलती। वो धारणाओं को तोड़ देती है। 27 फरवरी को जीडीपी की नई सीरीज़ जारी करते वक्त सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा था कि देश के रीयल जीडीपी की विकास दर वित्त वर्ष 2023-24 में 7.2%, 2024-25 में 7.1% और 2025-26 में 7.6% रही है। इसका 7% से ऊपर रहना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कम से कम इतनी विकास दर से ही भारत 2047 तक विकसितऔरऔर भी

भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन को सही मानें तो देश का जीडीपी सरकारी अनुमान से 22% कम हो सकता है। अभी जीडीपी की नई सीरीज़ के मुताबिक बीते वित्त वर्ष 2025-26 में हमारा रीयल जीडीपी 322.58 लाख करोड़ रुपए और नॉमिनल जीडीपी 345.47 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। इससे 22% कम तो रीयल जीडीपी 251.61 लाख करोड़ रुपए और नॉमिनल जीडीपी 269.47 लाख करोड़ रुपए निकलता है। सुब्रमण्यन के आकलन को एकऔरऔर भी

जीडीपी महज संख्या नहीं होती। वो देश की बेहतरी और बढ़ती खुशहाली का पैमाना है। लेकिन इसे मात्र आकार तक सीमित कर देना इसकी व्यापकता को कम कर देता है। बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसा पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। इसलिए तमाम देश जीडीपी से कहीं ज्यादा अहमियत देश में प्रति व्यक्ति आय को देते हैं, जिसे जीडीपी को आबादी से भाग देकर निकाला जाता है। लेकिन अपने यहां जीडीपी कोऔरऔर भी

सरकार विकास कर नहीं रही। विकास का झांसा दे रही है। सरकारी अर्थशास्त्री आपको समझाएंगे कि छोटे किसानों के लिए बजट में भारत-विस्तार की नई योजना है, जिसमें विस्तार का मतलब है वर्चुअली इंटीग्रेटेड सिस्टम टू एक्सेस एग्रीकल्चरल रिसोर्सेज़, ऐसा बहुभाषी एआई टूल जो हमारी कृषि का उद्धार कर देगा। दलाल पत्रकार और भांट भी बताएंगे कि विकसित भारत@2047 नारा नहीं, सचमुच का रोडमैप है। इनके तिलिस्म को तोड़ने के लिए आज हमें इस तंत्र का हिसाबऔरऔर भी