व्यक्ति से बाहर समाज की बात की जाए कि साल 2020 में कोरोना की पहली लहर से लेकर साल 2021 में दूसरी लहर तक सारी ज़िंदगी उलट-पुलट हो गई। अब भी कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा मंडरा रहा है। भारत सरकार के कोविड टास्क फोर्स के प्रमुख वी.के. पॉल ने तो कहा है कि ब्रिटेन से लेकर फांस व यूरोप के तमाम देशों में जिस तरह ओमिक्रॉन की मार बढ़ रही है, उसे देखते हुएऔरऔर भी

क्या रहे हैं साल 2021 के खास सबक? जिन्होंने भी शेयर बाज़ार से ट्रेडिंग को अपना प्रोफेशल बनाया है और इसी से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं, उन्हें ये सबक निजी स्तर पर निकालने होंगे। उन पर मनन करना होगा ताकि नकारात्मक बातों को पीछे छोड़ सकारात्मक बातों के साथ आगे बढ़ा जा सके। मोटेतौर उन्हें समझना होगा कि मन के भंवरजाल से मुक्त होकर वे शेयर बाज़ार में जो सचमुच हो रहाऔरऔर भी

ठीक दस ट्रेडिंग दिनों के बाद नया साल 2022 शुरू हो जाएगा। पहले दो दिन शनिवार-रविवार का अवकाश। फिर सोमवार 3 जनवरी से शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग का चक्र शुरू। यकीनन बीत रहा साल 2021 बहुत सारे लोगों के लिए बहुत-बहुत कठिन रहा है। इसमें साधारण इंसान से लेकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार बिल गेट्स तक शामिल हैं। गेट्स का कहना है कि 2021 उनके लिए अविश्सनीय रूप से कठिन रहा है। साथ हीऔरऔर भी

हर निवेशक या ट्रेडर रिटर्न का भूखा होता है। विदेशी निवेशक तो खासकर। अमेरिका से लेकर यूरोप व जापान तक के निवेशक विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफआईपी) के जरिए भारत से हर साल कम से कम 10-12% रिटर्न कमा रहे हैं जो उनके लिए अपने देश की तुलना में बहुत-बहुत ज्यादा है। वो भी मुद्रा उतार-चढ़ाव के रिस्क को मिटाकर क्योंकि रुपया डॉलर के मुकाबले बराबर 74-75 की रेंज में चल रहा है। विदेशी निवेशकों ने हमारे शेयरऔरऔर भी

सब कुछ जानते हुए भी डर तो लगता ही है। डरना और लालच करना इंसान का मूल स्वभाव है। शेयर बाज़ार में आनेवाले डर और लालच के दो ध्रुवों में खिंचे रहते हैं। एक तरफ लालच में फंसकर क्रिप्टो के जाल में फंस जाते हैं। दूसरी तरफ हिसाब लगाते हैं कि साल 2008 में रिलायंस पावर के आईपीओ के धमाके के बाद बाज़ार धराशाई हो गया था। इस बार तो ज़ोमैटो, नायिका और पेटीएम के आईपीओ केऔरऔर भी

जो निवेशक या ट्रेडर शेयर बाज़ार के मूल स्वभाव को समझते हैं, वे न तो उन्माद में उतराते हैं और न ही अवसाद में डूबते हैं। वे कभी न कयास में फंसते हैं और न भविष्यवाणियों से उलझते हैं। वे रिस्क और रिटर्न का अपना हिसाब दुरुस्त रखते हैं और हमेशा समभाव में रहते हुए मस्त रहते हैं। ट्रेडर जानता है कि यह ज़ीरो-सम गेम है। किसी के खाते का धन ही उसके खाते में आना है।औरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में 21 महीने से चल रही तेज़ी क्या कुछ दिनों के झटके के बाद वापस लौट आई है या नहीं? यह तेज़ी कहां तक जाएगी? कब इसमें बड़ा करेक्शन आ सकता है? कहीं बाज़ार 20% गिरकर तेज़ी से मंदी की गिरफ्त में न चला जाए! कयास लगाने और भविष्यवाणियां करनेवालों की कोई कमी नहीं। इनके पीछे भागेंगे तो कहीं चैन नहीं मिलेगा। वहीं, इनके भंवरजाल से मुक्त होकर देखें तो दो बातें पक्के तौरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश और ट्रेडिंग की राह निकालना किसी सैन्य युद्ध की योजना बनाने से कम नहीं। कितनी भी कुशल योजना बना लें, कुछ भी आपकी योजना के अनुरूप नहीं चलता। इसका मतलब यह नहीं कि बिना कोई योजना बनाए मैदान में कूद पड़ना चाहिए। योजना ज़रूर बनाएं, तैयारी भी पूरी करें। लेकिन हमेशा सतर्क रहें कि पल में सारे समीकरण बदल सकते हैं। इन बदलावों के माफिक ढलने की क्षमता रखें। बाज़ार अक्सर बड़ी तगड़ीऔरऔर भी

मल्टी-लेवल मार्केटिंग स्कीमों की तरह क्रिप्टो एक्सचेंजों के पीछे भी राजनेताओं की मिलीभगत बताई जाती है। उनकी ताकतवर लॉबी ने सरकार व नियामक संस्थाओं के हाथ बांध दिए हैं। लेकिन ज़मीनी स्थिति विकराल होती दिख रही है। ब्लॉकचेन एंड क्रिप्टो एसेट काउंसिल (बीएसीसी) ने हाल ही में एक विज्ञापन में दावा किया कि क्रिप्टो करेंसी में डेढ़ करोड़ से ज्यादा भारतीय करीब 6 लाख करोड़ रुपए लगा चुके हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर सारी क्रिप्टो मुद्राओं काऔरऔर भी

क्रिप्टो करेंसी में इस्तेमाल होनेवाली ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी बड़े काम की है। कई नामी कंपनियों समेत हमारा कॉरपोरेट क्षेत्र इसे पिछले कुछ साल से अपना भी चुका है। लेकिन रिजर्व बैंक से लेकर सेबी व भारत सरकार तक जैसी ढिलाही बरत रहे हैं, उसमें आम लोगों के बीच क्रिप्टो करेंसी का धंधा मल्टी-लेवल मार्केटिंग स्कीमों जैसे व्यापक फ्रॉड की शक्ल लेता जा रहा है। जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह फर्जी क्रिप्टो एक्सचेंज बनते जा रहे है। हज़ारों गुना रिटर्नऔरऔर भी