दुनिया के सबसे प्रसिद्ध निवेश वॉरेन बफेट ने कल ही अमेरिका में ऋण सीमा पर मची जिस तनातनी को जनसंहार का राजनीतिक हथियार कहा था, उसका संकट अब टल चुका है। अमेरिकी नेता सारी दुनिया को संकट में डालने का जोखिम उठा भी नहीं सकते थे। इसलिए संसद के दोनों सदनों सीनेट व प्रतिनिधि सभा ने ऋण सीमा को बढ़ाने का प्रस्ताव पास कर दिया। राष्ट्रपति ओबामा ने इस पर मोहर भी लगा दी है। अब आगे…औरऔर भी

शनिवार को एक शख्स से मिला जिनका अंदाज़ देखकर दिल गदगद हो गया। साथ गए सज्जन के मुंह से जैसे ही ‘टिप’ शब्द निकला, भाई पलटकर बोला, “टिप वेटर लेते हैं और मैं कोई वेटर नहीं हूं।” वाकई वेटर की मानसिकता से ट्रेडिंग में कामयाबी नहीं मिल सकती। किसी भी सलाह को जब तक आप अपने सिस्टम पर अलग-अलग टाइमफ्रेम में परख नहीं लेते, तब तक उस पर ट्रेडिंग करना गलत है। अब परखें मंगल की दशा-दिशा…औरऔर भी

जिस तरह हमारे शरीर की सीमाएं हैं, उसी तरह हमारे दिमाग की भी सीमाएं हैं। मानव मस्तिष्क को पांच से ज्यादा वेरिएबल्स दे दो तो वह फ्रीज़ हो जाता है, कन्फ्यूज़ होकर काम ही करना बंद कर देता है। इसलिए बाज़ार का विश्लेषण करते वक्त पांच से ज्यादा संकेतकों या अलग डाटा का इस्तेमाल हमें भ्रमित कर सकता है। हमें चार्ट से बाज़ार में सक्रिय लोगों की सक्रियता समझनी है। अब करते हैं आगाज़ इस हफ्ते का…औरऔर भी

अगर आप बूढ़े व अशक्त नहीं हैं और पहाड़ चढ़ रहे हों तो बड़ा छोड़कर छोटा रास्ता अपनाते हैं, भले ही वहां पैर फिसलने का जोखिम हो। दरअसल, मानव मस्तिष्क के तार जुड़े ही ऐसे हैं कि हम स्वभावतः शॉर्टकट को तरजीह देते हैं। लेकिन लंबे निवेश में शॉर्टकट की मानसिकता बेहद नुकसानदेह साबित होती है। इसलिए हमें संयम और अनुशासन से खुद को शॉर्टकट की तरफ जाने से रोकना पड़ता है। अब आज की चुनिंदा कंपनी…औरऔर भी

गिरता स्टॉक थोड़ा उठ जाए तो क्या! बढ़ता स्टॉक थोड़ा गिर जाए तो क्या!! नियम कहता है कि साल-छह महीने से बढ़ते शेयर को शॉर्ट न करें और साल-छह महीने से गिरते शेयर में लांग पोजिशन न पकड़ें। ऐसा नहीं कि गिरते शेयर थोड़े दिन बढ़ नहीं सकते या बढ़ते शेयर कुछ दिन गिर नहीं सकते। लेकिन अपट्रेंडिंग स्टॉक्स में लांग और डाउनट्रेंडिंग स्टॉक्स में शॉर्ट करना ट्रेडिंग में रिस्क को घटाने की रणनीति है। अब आगे…औरऔर भी

ट्रेडिंग के न जाने कितने इंडीकेटर, कितनी विधियां। टेक्निकल एनालिसिस से लेकर फिबोनाकी और इलियट वेव तक। यहां से 62% ऊपर, वहां से 38% नीचे। सीखने जाओ तो माथा घूम जाए। सभी अपने तरीके को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं। लेकिन वे अंदर से क्या मानते हैं इसका पता चलेगा इससे कि वे यह सब करते हुए कमाते कितना हैं जिसे वे छिपा जाते हैं। सिस्टम वही ठीक जो कराए कमाई, बाकी बकवास। अब रुख गुरु के बाज़ार का…औरऔर भी

खबर यकीकन शेयर बाज़ार और संबंधित शेयरों के लिए अहमियत रखती है। लेकिन बनने से लेकर हमारे पास पहुंचने तक वो गुल खिला चुकी होती है। उस पर खेलनेवालों की तेज़ी को हम मात नहीं दे सकते है। इसलिए खबर हमारे जैसे आम निवेशकों का ट्रेडिंग टूल कतई नहीं बन सकती। जिस दिन बड़ी खबर हो, उस दिन बाज़ार से दूर रहना बेहतर। बासी खाना और बासी खबर हमारे लिए त्याज्य है। देखें अब बुध का बाज़ार…औरऔर भी

हम बाज़ार या किसी स्टॉक के बारे में दो-चार सूचनाओं के आधार पर मन ही मन धारणा बना बैठते हैं और उसे बाज़ार पर आरोपित करते हैं। ठाने रहते हैं कि बाज़ार आज नहीं तो कल ज़रूर हमारे हिसाब से चलेगा। चार्ट पर भी हम अपनी पुष्टि के लिए मनमाफिक आकृतियां देख लेते हैं। लेकिन जब तक इस मूर्खता/आत्ममोह से निकलकर हम मुक्त मन से बाज़ार को नहीं देखते, तब तक पिटते रहेंगे। अब दशा-दिशा आज की…औरऔर भी

बड़े-बूढ़े कहते हैं कि दो-चार आदमी गलत हो सकते है, लेकिन हज़ारों-लाखों लोग गलत नहीं हो सकते। पर शेयर बाज़ार में लगता है कि इसका उल्टा है। यहां 95% ट्रेडर बड़ी मशक्कत के बावजूद घाटा खाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे कुछ न कुछ गलती कर रहे हैं। सफल ट्रेडिंग का आधार ऐसा सूत्र है जिसमें दुरूहता नहीं, सरलता हो, जिससे आसानी से नोट बनाए जा सकें। हम उलझाते नहीं, सुलझाते हैं। अब देखें आज का बाज़ार…औरऔर भी

केवल कंपनियां ही पूंजी व श्रम के सहयोग से अर्थव्यवस्था में मूल्य जोड़ती हैं। बाकी सब व्यापार का चक्र और मुद्रा की फेटमबाज़ी है। इसीलिए कोई बैंक एफडी, यहां तक कि इनफ्लेशन इंडेक्स बांड भी मुद्रास्फीति को नहीं हरा सकते। केवल और केवल कंपनियों के मालिकाने में हिस्सेदारी यानी इक्विटी में निवेश से हम अपनी बचत को मुद्रास्फीति की मार से बचाकर बढ़ा सकते हैं, बशर्ते सही कंपनियां चुनी जाएं। तथास्तु में एक और ऐसी ही कंपनी…औरऔर भी