ऑस्ट्रेलिया से लेकर अमेरिका, यूरोप व एशिया तक में सक्रिय अग्रणी ब्रोकरेज़ फर्म सीएलएसए ने डराया है कि भारत का शेयर बाज़ार 30% तक गिर सकता है। CLSA कोई ऐसी-गैरी फर्म नहीं है। उसने दुनिया में बढ़ती ब्याज दर, सरकारी बांडों पर बढ़ते यील्ड और अमेरिका से लेकर यूरोप तक गिरते शेयर बाज़ार के ट्रेन्ड और भारत की विशेष स्थिति के आधार पर यह भविष्यवाणी की है। लेकिन जो लोग ज़मीन पर गिरे हीरों को चुनने काऔरऔर भी

नियमतः शत-प्रतिशत और व्यवहार में अधिकांश इंट्रा-डे ट्रेडर व्यक्तिगत स्तर पर ट्रेड करते हैं। भोर में घर से निकल जाते हैं। किसी ब्रोकर या सब-ब्रोकर के यहां दिन के दिन में सौदे निपटाकर देश शाम घर लौट जाते हैं। उनकी यह भी खासियत है कि वे कहीं से भी मिल गई टिप्स क पीछे भाग पड़ते हैं। इस चक्कर में ऐसे आलतू-फालतू स्टॉक्स पर दांव लगा बैठते हैं जिनके बारे में किसी से खास कुछ सुना नहींऔरऔर भी

इंट्रा-डे ट्रेडिंग के कुछ नियम-धर्म हैं जिनका पालन ज़रूरी है। पहला, उन्हीं स्टॉक्स में ट्रेड करें जिनमें अच्छा-खासा कारोबार होता है। व्यावहारिक मतलब यह कि निफ्टी-50, निफ्टी नेक्स्ट-50 या निफ्टी-100 जैसे सूचकांकों में शामिल स्टॉक्स में ही ट्रेड करें। दूसरा, कभी भी बाज़ार से पंगा न लें। उसके रुख से उल्टा चलने का दुस्साहस न करें। बाज़ार कमज़ोरी के संकेत दे रहा है तो कभी भी खरीद के सौदे न करें और सामर्थ्य हो तो शॉर्ट करें।औरऔर भी

इंट्रा-डे ट्रेडिंग शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा रिस्की व तनाव भरा उद्यम है, शायद फ्यूचर्स व ऑप्शंस से भी ज्यादा। मगर न जानें क्यों हमारी पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने इसे व्यक्तिगत निवेशकों या कहें तो रिटेल ट्रेडरों के लिए ही खोल रखा है। संस्थाओं का प्रवेश इसमें वर्जित है। संभव है कि बैंक, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) इसे मानते हों। लेकिन जितने भी ब्रोकरेज हाउसेज़ हैं, वे तो जमकर डे-ट्रेडिंगऔरऔर भी

वित्तीय जगह में नीतियों से लेकर बाज़ार तक भारी उथल-पुथल का दौर चल रहा है। अपने यहां रिजर्व बैंक ने ब्याज दर एक बार फिर 0.50% उठाकर 5.90% पर पहुंचा दी। अमेरिका का फेडरल रिजर्व कई बार ब्याज बढ़ाने के बाद आगे भी बढ़ाते रहने पर आमादा है। शेयर बाजार ऐसी भारी उहापोह में जमकर ऊपर-नीचे होता रहता है। हालत यह है कि दिन में निफ्टी का 200-250 अंक उठना-गिरना आज सामान्य बात बन गई है। ऐसेऔरऔर भी

अच्छा निवेश वो है जिसमें मूलधन सुरक्षित रहे और इतना संतोषजनक रिटर्न मिले जो महंगाई को बेअसर कर सके। निवेश के गुरु बेन ग्राहम ने निवेश की एक और परिभाषा दी है। निवेश वो है जिसे मात्रा और गुणवत्ता, दोनों पैमानों पर खरा पाया जाए। कंपनी में निवेश संबंधी मात्रात्मक पहलुओं में उसके धंधे व लाभ की वृद्धि दर, ऋण-इक्विटी अनुपात, इक्विटी व नियोजित पूंजी पर रिटर्न, लाभ मार्जिन और लाभांश रिकॉर्ड वगैरह आते हैं। इन परऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो या संस्थागत निवेशक आज भारतीय शेयर बाज़ार में हर्षद मेहता जैसे बड़े ऑपरेटर की हैसियत हासिल कर चुके हैं। जब चाहते हैं किसी कंपनी या क्षेत्र के शेयरों को उठा या पीट देते हैं। उन्हें धीरे-धीरे बटोरने के बाद चढ़ाने लगते हैं और जमकर मुनाफा कमाते हैं। उन्होंने हाल में आईटी क्षेत्र के साथ यही किया। ऐसा बेचा कि इन्फोसिस, विप्रो, टीसीएस, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, टेक महिंद्रा व ओरैकल फाइनेंशियल सर्विसेज़ जैसी कंपनियों के शेयर 52औरऔर भी

क्या एफआईआई फिर लौटकर पहले जैसे जोशोखरोश के साथ भारत आएंगे? यकीनन, उनको आना ही है, बशर्ते भारतीय बाज़ार में उन्हें अमेरिका या अन्य विकसित देशों से ज्यादा रिटर्न मिलता है। अर्थशास्त्रियों से लेकर तमाम बाज़ार विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का कितना भी कुप्रबंधन कर लिया जाए, लेकिन उसकी आंतरिक सामर्थ्य इतनी ज्यादा है कि उसे निखरने से कोई रोक नहीं सकता। वैसे, अब भी हम गौर करें तो सेंसेक्स का प्रदर्शन डाउ जोन्सऔरऔर भी

आज विदेशी संस्थागत या पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) हमारे शेयर बाज़ार के दिशा-निर्धारक बन गए है। पूरे बाजार ही नहीं, तमाम अच्छे-खासे मजबूत स्टॉक्स की नियति उनकी मुठ्ठी में है। वे ही इनका रुख तय करते हैं। कोई फंडामेंटल नहीं, केवल विदेशी धन या निवेश का प्रवाह भावों को तय करने लगा है। मौजूदा साल 2022 में जुलाई से अब तक भारतीय शेयर बाज़ार में 57,579 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद के बावजूद उन्होंने कुल मिलाकर 1,59,779 करोड़औरऔर भी

अमेरिका का शेयर बाज़ार घटे-बढ़े तो टोक्यो का शेयर बाज़ार घट-बढ़ जाता है। इनके असर से भारत से लेकर कोरिया तक के स्टॉक एक्सचेंज बच नहीं पाते। कभी-कभी लंदन और ऑस्ट्रेलिया की दिशा अलग होती है। लेकिन यूरोप के शेयर बाज़ार तो कुल मिलाकर अमेरिका को ही फॉलो करते हैं। ऐसे में तमाम देशों की अपनी अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति शेयर बाज़ार के संदर्भ में अक्सर बेमानी हो जाती है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति निर्णायक। आखिर क्याऔरऔर भी