हमारा पूंजी बाज़ार बम-बम कर रहा है। एनएसई दुनिया में पहले नंबर का डेरिवेटिव्स एक्सचेंज बन चुका है। लेकिन जिस श्रम की बूंद-बूंद से पूंजी बनती है, उसी श्रम बाज़ार की हालत खस्ता है। इसमें कम पढ़े-लिखे लोगों को काम मिल जाता है। लेकिन उच्च शिक्षा की अवहेलना होती है। हुआ यह कि अपने यहां 1990 के दशक के उत्तरार्ध में उच्च शिक्षा जमकर बढ़ी। इंजीनियरिंग कॉलेज खूब खुले ताकि आईटी इंजीनियरों की मांग पूरी की जाऔरऔर भी

शेयर का भाव देखकर नहीं पता चलता कि वह सस्ता है या महंगा। 5 रुपए का भी कोई शेयर महंगा हो सकता है और 5000 रुपए का शेयर भी सस्ता। शेयर महंगा है या सस्ता, इसका सबसे प्रचलित पैमाना है पी/ई अनुपात, मतलब शेयर का भाव कंपनी के प्रति शेयर लाभ (ईपीएस) से कितना गुना चल रहा है या बाज़ार कंपनी के प्रति शेयर एक रुपए के लाभ के लिए कितना दाम देने को तैयार है। दूसराऔरऔर भी

भारत में रोज़गार प्राप्त लोगों में से ज्यादातर बहुत कम पढ़े-लिखे हैं। सितंबर-दिसंबर 2022 की तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक रोज़गार में लगी हमारी श्रमशक्ति में से 40% दसवीं से बारहवीं तक पढ़े हैं। वहीं, 48% श्रमिक तो दसवीं तक भी नहीं पढ़े हैं। इनमें से 28% छठी से आठवीं तक पढ़े हैं, जबकि 20% केवल पांचवीं पास हैं जिन्हें अशिक्षित ही माना जा सकता है क्योंकि पहली से पांचवीं तक बच्चों को यूं ही आगे खिसकाऔरऔर भी

अमेरिका के श्रम विभाग ने 5 मई को घोषित कर दिया कि वहां अप्रैल में बेरोज़गारी की दर 3.4% थी। अपने यहां तो बेरोजगारी का सबसे नया सरकारी आंकड़ा वित्त वर्ष 2021-22 का है। एक महीना नहीं, पूरे एक साल से ज्यादा पुराना। उस राष्ट्रव्यापी रोज़गार सर्वे में बताया गया था कि देश में बेरोज़गारी की दर मात्र 4.1% थी। जिस भारत देश में चपसारी के 91 पदों के लिए 2.25 लाख आवेदन आ जाते हों, जिनमेंऔरऔर भी

इंडिया दैट इज़ भारत। इंडिया और भारत एक ही हैं। लेकिन दो भारत बने हुए हैं और दोनों का दरमियानी फैसला बढ़ता ही जा रहा है। एक तरफ हमारे अधिकांश शहर बम-बम कर रहे हैं। मॉल्स में लोगों का मेला है। हवाई अड्डे भरे पड़े हैं। फ्लाइट्स सारी बुक हैं। ट्रेनों में रिजर्वेशन नहीं मिलता। तमाम फिल्में करोड़ों का धंधा कर रही हैं। रेस्टोरेंट खचाखच। जीएसटी कलेक्शन बढ़ता ही जा रहा है। दूसरी तरफ महानगरों में फ्लाईओवरऔरऔर भी

अपने भारत की ज़मीनी हकीकत यह है कि यहां बेरोज़गारी के सारे आंकड़े व पैमाने फेल हो जाते हैं। दुनिया भर में बेरोज़गारी दर की परिभाषा यह है कि 15 साल से ऊपर की कामकाज़ी उम्र के जितने लोग काम की मांग कर रहे हैं, उनमें से कितने प्रतिशत लोगों को काम नहीं मिल रहा। जितने लोग काम मांग रहे हैं, उनकी कुल संख्या को देश की श्रमशक्ति भी कहा जाता है। अपने यहां विचित्र स्थिति हैऔरऔर भी

माना जाता है कि अर्थव्यवस्था बढ़ेगी तो रोज़गार के नए असर पैदा होंगे और काम करनेवालों को अपने श्रम का बेहतर दाम मिलेगा। लेकिन अपने यहां तो कबीर की उलटबांसियां ही चल रही हैं। वित्त वर्ष 2014-15 से 2021-22 तक हमारा जीडीपी 5.35% की औसत सालाना रफ्तार से बढ़ा है। लेकिन रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान वास्तविक मजदूरी 1% सालाना से भी कम दर से बढ़ी है। यह कृषि मजदूरों के लिए 0.9%, कंस्ट्रक्शनऔरऔर भी

एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि हम कितनी भी मशक्कत कर लें, निवेश में सफलता रातोंरात नहीं मिलती। इसके लिए समय, अनुशासन व धैर्य की दरकार होती है। अगर आपको लगता है कि शेयर बाज़ार से खटाखट नोट कमाने का कोई फॉर्मूला है तो यह विचार फौरन जेहन से निकालकर दूर फेंक दें। साथ ही हमें निवेश और सट्टेबाज़ी के अंतर को साफ समझ लेना चाहिए। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग एक तरह का सट्टाऔरऔर भी

भारत जैसा शानदार डेमोग्रैफिक डिविडेंड वाला देश अगर अपनी पूरी श्रमशक्ति का उपयोग नहीं कर रहा है तो अर्थव्यवस्था अपनी संपूर्ण संभावना कतई नहीं हासिल कर सकती। हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दम भरते हैं। लेकिन ‘द इकनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक दुनिया में केवल नौ देश हैं जहां बेरोज़गारी की दर भारत से ज्यादा है। ये देश हैं ग्रीस, इटली, स्पेन, तुर्किए, ब्राज़ील, चिली, कम्बोडिया, मिस्र व सऊदी अरब। वो भी तब, जबऔरऔर भी

इतनी विपुल श्रमशक्ति वाले भारत में श्रम की इतनी उपेक्षा क्यों? अपने यहां अमेरिका या अन्य विकसित देशों की तरह ज्यादातर लोग रोज़गार दफ्तरों से काम मांगने नहीं जाते। फिर भी सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी) के मुताबिक देश में इस वक्त करीब 5 करोड़ लोग काम करने को उत्सुक हैं, मगर उन्हें काम नहीं मिल रहा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में 2017-18 में बेरोजगारी की दर 6.1% के साथ 45 सालों के उच्चतम स्तरऔरऔर भी