एक तरफ शेयर बाज़ार बढ़ रहा है, दूसरी तरफ बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है। सीएमआईई के ताज़ा डेटा के मुताबिक अप्रैल में बेरोज़गारी की दर बढ़कर 7.83% हो गई है। यह महीने भर पहले मार्च में 7.60% हुआ करती थी। सबसे ज्यादा 34.5% बेरोजगारी हरियाणा में है, उसके बाद 28.8% राजस्थान, 21.1% बिहार और 15.6% जम्मू-कश्मीर में। बेरोजगारी के साथ ही जिनके पास किसी तरह का रोज़ी-रोजगार है, उनकी आमदनी घट रही तो खपत भी घटती जाऔरऔर भी

पिछले दो लोकसभा चुनावों के ठीक पहले शेयर बाज़ार में तेज़ी का उफान देखा गया था। लेकिन इस बार बाज़ार में हाई-टाइड उतरता दिख रहा है। बीएसई सेंसेक्स 9 अप्रैल को 75124.28 के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया। उसके बाद करीब एक महीने में अब तक 2.15% गिर चुका है। इधर अक्सर बाज़ार सुबह खुलता तो है बढ़कर, लेकिन थोड़ी देर या दोपहर बाद मुनाफावसूली उसे नीचे खींच से जाती है। खास बात यह है कि मुनाफाऔरऔर भी

भारतीय समाज में धन-दौलत व संपदा की संरचना बहुत तेज़ी से बदलती जा रही है। 1950-51 में देश की सालाना घरेलू बचत का 91.4% हिस्सा ज़मीन-जायदाद व सोने-चांदी जैसी भौतिक संपदा के रूप में था। 2021-22 तक यह हिस्सा घटते-घटते 38.6% पर आ गया, जबकि बाकी 61.4% घरेलू बचत बैंक डिपॉजिट, शेयर, डिबेंचर व म्यूचुअल फंड में निवेश, लघु बचत, बीमा पॉलिसी और पीएफ व पेंशन फंड के रूप में थी। इस तरह हमारी धन-दौलत का वित्तीयकरणऔरऔर भी

सब कुछ नकली, सब कुछ फर्जी, सब कुछ झूठ। केवल दिखावा और अतिरंजना। हांकने व फेंकने की सारी की सारी सीमाएं पार। छिलके उतारते जाओ तो अंदर से सब खोखला। बाकी बातों पर तो शक व संदेह की गुंजाइश है। लेकिन शायद ही किसी को कोई संदेह हो कि मोदीराज के दस साल में शेयर बाज़ार की तेज़ी ने सबको पीछे छोड़ दिया है। गुजरात के अमित शाह व विजय रूपाणी जैसे शेयर ब्रोकरों की पार्टी कोऔरऔर भी

एक बार जो चल जाए, उसका सिक्का लम्बा चलता रहता है। राजनीति से लेकर बिजनेस तक में ऐसे ही सिक्के चलते और उछलते हैं। नरेंद्र मोदी का सिक्का 10-15 साल में ऐसा चला दिया गया कि प्रधानमंत्री रहते भले ही उन्होंने आम जीवन से जुड़ा अपना कोई वादा पूरा नहीं किया, राममंदिर बनाकर और अनुच्छेद 370 हटाकर केवल भाजपा और संघ का एजेंडा पूरा किया, फिर भी लाखों पुरुष व महिला मतदाता कहते हैं कि हम तोऔरऔर भी

आईएमएफ या अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के 80 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब उसे आधिकारिक रूप से अपने किसी कार्यकारी निदेशक के बयान से पल्ला झाड़ना पड़ा। हुआ यह कि आईएमएफ के कार्यकारी निदेशक कृष्णमूर्ति सुब्रमणियन ने नई दिल्ली में 28 मार्च को एक आयोजन में ऐलानिया कहा कि भारत ने पिछले दस सालों में जो नीतियां अपनाई हैं, उससे वो 2047 तक सालाना 8% की विकास दर से बढ़ सकता है। इसके हफ्तेऔरऔर भी

चालू वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.5% लेकर 7% की दर से बढ़ सकती है और वो दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। लेकिन इसके पीछे का मुख्य कारक भारत की आबादी और बाज़ार का काफी बड़ा होना है। माकूल नीतियों और आंतरिक ताकत की बात करें तो सारी शान-पट्टी के बावजूद भारत की प्रति व्यक्ति आय जी-20 के देशों में सबसे कम है। विश्व बैंक के मुताबिक भारत की प्रतिऔरऔर भी

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्य़ाशी नरेंद्र मोदी साल 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले बढ़-चढ़कर दावा करते थे कि सत्ता में आने पर रोजगार के अवसरों की बाढ़ ला देंगे। तब हर तरफ खबरें आती थी कि भारत में हर साल एक से डेढ़ करोड़ नए नौजवान रोजगार की लाइन में लग जाते हैं। मोदी ने दो कदम आगे बढकर कहा था कि वे अपनी सरकार बनने पर हर साल दो करोड़औरऔर भी

देश के आम ही नहीं, अधिकांश खास लोग भी मानते हैं कि इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी है और 4 जून को आम चुनावों के नतीजों के बाद जो नई सरकार बनेगी, उसके सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बेरोज़गारी ही रहेगी। यह निष्कर्ष है प्रमुख समाचार एजेंसी रॉयटर्स द्वारा बड़े राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्रियों के बीच किए गए सर्वे का। रॉयटर्स ने 16 अप्रैल से 23 अप्रैल के बीच ऐसे 26 अर्थशास्त्रियोंऔरऔर भी

अगर आपका निवेश कुछ दिनों, महीने या साल भर में 20% गिर जाए और आपकी रातों की नींद हराम हो जाए तो साफ हो जाता है कि आपकी रिस्क क्षमता शेयर बाज़ार में निवेश करने की नहीं है। तब आपको एफडी या बॉन्ड जैसे शांत माध्यमों में निवेश करना चाहिए। हम निवेश मन की शांति खोने के लिए नहीं, बल्कि आज और कल को सुरक्षित व शांत रखने के लिए करते हैं। ज्यादा रिटर्न सभी को अच्छाऔरऔर भी