अगले कुछ महीनों में कई भारतीय और चीनी कारें अमेरिकी बाजार में पेश की जाने वाली हैं। लेकिन एक नई रिपोर्ट में पाया गया कि ज्यादातर अमेरिकी टाटा, महिंद्रा और बीवाईडी जैसी कंपनियों की कारें नहीं खरीदना चाहते। बाजार अनुसंधान कंपनी जीएफके ऑटोमोटिव की एक रिपोर्ट में पाया गया कि चीन और भारत के वाहन निर्माताओं को वही दिन देखने पड़ेंगे जो कोरियाई वाहनों को अमेरिका में लांच किए जाने के बाद देखना पड़े थे। उपभोक्ताओं कोऔरऔर भी

अमेरिका की ऋण सीमा का बवाल भले ही इस महीने उठा हो और स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने उसकी रेटिंग दो हफ्ते घटा दी हो, लेकिन दुनिया भर के देश दो महीने पहले से ही अमेरिकी बांडों में अपना निवेश घटाने लगे हैं। मई में जहां दुनिया के तमाम देशों ने अमेरिकी बांडों में 4516 अरब डॉलर लगा रखे थे, वहीं जून में उनका निवेश घटकर 4499.2 अरब डॉलर रह गया। लेकिन इस दौरान चीन व ब्रिटेन जैसेऔरऔर भी

अमेरिका में हड़कंप मचाने के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एस एंड पी) ने चेतावनी दी है कि वह भारत, जापान और मलयेशिया जैसे देशों की क्रेडिट रेटिंग भी घटा सकती है। फिलहाल भारत की क्रेडिट रेटिंग बीबी (-) है। निवेश के लिहाज से यह रेटिंग का काफी निचला स्तर माना जाता है। कमजोर रेटिंग से भारत सरकार समेत भारतीय कंपनियों को विदेशी कर्ज के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ता है। एस एंड पीऔरऔर भी

प्रमुख अंतरराष्ट्रीय निवेश फर्म गोल्मैन सैक्श ने भारत की रेटिंग बढ़ाकर ‘मार्केट वेट’ कर दी है। पिछले साल से अभी तक उसने भारत को इससे कम ‘अंडर वेट’ की श्रेणी में रखा हुआ था। रेटिंग बढ़ाने का मतलब यह हुआ कि भारतीय शेयर बाजार को लेकर उसकी धारणा में हाल-फिलहाल थोड़े समय के लिए तेजी की हो गई है। गोल्डमैन सैक्श ने रेटिंग बढ़ाने की वजह कच्चे तेल में आ रही गिरावट और नीतिगत सुधारों पर सरकारऔरऔर भी

देश में भले ही स्विटजरलैड के बैंकों में रखे काले धन को लेकर राजनीतिक माहौल बना दिया गया हो, लेकिन भावना से परे हटकर देखें तो यह रकम बहुत मामूली है। स्विटजरलैंड के केंद्रीय बैंक के मुताबिक उनके देश के बैंकों में रखे गए विदेशी नागरिकों के कुल धन में भारतीयों का हिस्सा महज 0.07 फीसदी है। यह पाकिस्तान से भी कम है। जैसे अपना केंद्रीय बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक है, वैसे ही स्विटजरलैंड का केंद्रीय बैंक,औरऔर भी

अमेरिकी अर्थव्यवस्था ठहराव की शिकार हो चुकी है, जबकि चीन व भारत की अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ रही हैं और इन देशों का मध्यवर्ग भी तेजी से बढ़ रहा है। इसलिए अमेरिकी कंपनियां अपने देश की सरहदें फलांग कर चीन व भारत के मध्यम वर्ग को पकड़ना चाहती हैं। खुद अमेरिकी सरकार ने अपनी कंपनियों से इन देशों के बढ़ते मध्यम वर्ग का फायदा उठाने को कहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मामलों के वाणिज्य उपमंत्री फ्रांसिस्को सांचेज नेऔरऔर भी

भारत को परमाणु बिजली के क्षेत्र में झाड़ पर चढ़ाने की कोशिश हो रही है क्योंकि जब बाकी दुनिया परमाणु बिजली को तौबा कर रही है तब भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हैं जो इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का मंसूबा पाले हुए है और बाहर से परमाणु रिएक्टर आयात कर सकता है। लेकिन भारत में आम राय इसके खिलाफ न जाए, इसलिए ऐसा दिखाने की सायास कोशिश हो रही है कि भारत इसऔरऔर भी

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनपीसीआईएल (न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) ने सोमवार को राजस्थान के रावतभाटा में 700 मेगावॉट के परमाणु बिजली संयंत्र की आधारशिला रख दी। इसे परमाणु संयंत्रो के लिए तकनीकी भाषा में एफपीसी (फर्स्ट पोर ऑफ कांक्रीट) कहते हैं। एफपीसी की तारीख से परमाणु संयंत्र का निर्माण शुरू हुआ माना जाता है। रावतभाटा का यह संयंत्र या रिएक्टर देश में बनाए गए 700 मेगावॉट के दो प्रेसराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) का हिस्साऔरऔर भी

मई 2011 में भारत से सेवाओं का निर्यात अप्रैल के मुकाबले 3.2 फीसदी बढ़कर 11.83 अरब डॉलर पर पहुंच गया। रिजर्व बैंक ने एक बयान में कहा कि अप्रैल, 2011 में देश से 11.46 अरब डॉलर मूल्य की सेवाओं का निर्यात किया गया था। मई में सेवाओं का आयात भी 2.8 फीसदी बढ़कर 7.08 अरब डॉलर का रहा, जो अप्रैल में 6.88 अरब डॉलर का था। चालू वित्त वर्ष 2011-12 में अप्रैल-मई के दौरान सेवाओं का सकलऔरऔर भी

दुनिया भर में मांग में जबरदस्त तेजी के चलते भारत का कॉफी निर्यात जून में 55 फीसदी बढ़कर 40,000 टन पर पहुंच गया। यह बीते साल की इसी अवधि में 25,710 टन का था। कॉफी बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया कि जून के महीने में कॉफी का निर्यात करीब 40,000 टन रहा। हालांकि अप्रैल और मई के निर्यात के मुकाबले यह कम है। भारत से मई 2011 में 80,367 टन कॉफी का निर्यात किया गया जोऔरऔर भी