पिता भी पुत्र भी
कालरूपी परमात्मा ने ही इन सभी लोकों को धारण किया हुआ है। वह कालरूपी परमात्मा ही इन सभी लोकों में चारों ओर व्याप्त है। वही इन सब प्राणियों का पिता भी है और इन सबका पुत्र भी। संसार में उससे बड़ी कोई शक्ति नहीं। ।।अथर्ववेद।।और भीऔर भी
घर में निर्वासित
आज़ादी के पहले और इतने सालों बाद भी जिन हिंदुस्तानियों ने अंग्रेज़ी को अपनाया, विकास और उन्नति का हर रास्ता उनके लिए खुल गया। बाकी लोग निर्वासित हैं। अपनी माटी को दुत्कारती यह कैसी व्यवस्था है जिसे हम ढोए चले जा रहे हैं?और भीऔर भी
तकरार का तुक!
मैं बड़ा कि तू? तू सही कि मैं? जब घनघोर समस्याएं हर तरफ से दबोचे हुए हों, तब ऐसी तकरार का क्या तुक! ऐसे में मुनासिब यही है कि सारे मतभेदों को भुलाकर समस्या से एक साथ जूझा जाए। अहं का मसला बाद में फिर कभी निपटा लेंगे।और भीऔर भी
नीयत है नाकाफी
किसी काम की सफलता के लिए अच्छी व सच्ची नीयत होना जरूरी तो है, पर्याप्त नहीं। अक्सर हम सच्ची नीयत के बावजूद एकदम नाकाम हो जाते हैं। कारण, जिस माध्यम पर काम कर रहे होते हैं, उसमें हो रहे बदलावों से हम आंखें मूंदे रहते हैं।और भीऔर भी
विवेक और स्मृति
विवेक तर्क की स्वाभाविक परिणति है, स्मृति विवेकयुक्त साधना और एकात्मता साधनायुक्त स्मृति की। तर्क विवेक तक ले जाता है। स्मृति अपने उत्स की ओर लौटना है। एकात्मता की अवस्था में तो जीने-मरने जैसे द्वैतभाव ही मिट जाते हैं।और भीऔर भी
बुद्धि की चर्बी
पढ़ा बहुत कुछ, पचाया कुछ नहीं तो बुद्धि पर चर्बी चढ़ जाती है। उसी तरह जैसे खाना अगर पूरा पचा नहीं तो शरीर पर चर्बी बनकर चढ़ता जाता है। इसलिए पढ़ें उतना ही, जितना पचा सकें। ध्यान दें, ज्यादातर बुद्धिजीवी अपच के शिकार होते हैं।और भीऔर भी
कहां हो विष्ण गुप्त!
दुत्कारा गया जानवर, भिखारी या गरीब किसी कोने में दुबक कर रह जाता है। वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ पाता। लेकिन सत्ता के गलियारों से तिरष्कृत विष्णु गुप्त एक दिन चाणक्य बन पूरे नंद वंश का ही नाश कर नई सत्ता बना डालता है।और भीऔर भी
