विश्लेषण के लिए अंश को अलग देखना सही है। लेकिन हर अंश संपूर्ण के साथ इस कदर गुथा हुआ है कि उसे छोड़ देने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है। पेट में गया भोजन ऊर्जा बनता है, जबकि थाली में रखा व्यंजन कुछ घंटों बाद सड़ने लगता है।और भीऔर भी

अंश-अंश में सब सही। पर संपूर्ण आते ही भ्रम में पड़ जाते हैं कि आखिर कौन है सही, क्या है सही? बीच में झूलेंगे तो हमेशा भ्रमित रहेंगे, जबकि कोई पाल्हा पकड़ लेंगे तो सारा भ्रम भूत की तरह भाग जाएगा।और भीऔर भी

संपूर्ण कमोबेश स्थिर है। पर अंश बराबर रीसाइकल होता रहता है। बनने-मिटने-बनने का चक्र अनवरत चलता है। ये नीरस-सा चक्र ही जीवन है। यह चक्र रुक जाए तो हर तरफ हाहाकार मच जाएगा।और भीऔर भी

हम सभी के अंदर एक चुम्बक है जो माफिक चीजों को खींचकर लगातार एक पैटर्न बनाता रहता है। इसी पैटर्न से हमारा व्यक्तित्व बनता है, जबकि इसका एक अंश शब्दों का आकार पाकर विचार बन जाता है।और भीऔर भी

थोड़े-थो़ड़े अंश में हम सब कुछ हैं। संत भी, अपराधी भी। बालक भी, वृद्ध भी। सांप भी, बिच्छू भी। बेध्यान न रहें तो अपना अंश बाहर दिखेगा और दूसरों का अंश अपने अंदर। ऐसा देखने से हर उलझन सुलझने लगती है।और भीऔर भी