दो साल से भारतीय शेयर बाज़ार की वाट लगी हुई है। जिन दो सालों में दक्षिण कोरिया का कम्पोजिट सूचकांक 114.9%, ब्राज़ील का बोवेस्पा सूचकांक 57.9%, अमेरिका का एस एंड पी 500 सूचकांक 31.3%, लंदन का फुटसी सूचकांक 29.3% और हांगकांग का हैंगसेंग सूचकांक 12.2% बढ़ा है, उन्हीं दो सालों में हमारा निफ्टी-50 सूचकांक 6.3% गिरा है। इस साल हैंगसेंग सूचकांक 12.3% गिरा है, जबकि बाकी चार सूचकांक 7.4% से 28.8% तक बढ़े हैं। मगर इस साल अब तक अपना निफ्टी-50 सूचकांक 12.98% गिर चुका है। कारण बड़ा साफ है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) अप्रैल 2024 से अब तक हमारे शेयर बाज़ार से शुद्ध रूप से ₹4.83 लाख करोड़ निकाल चुके हैं। हमारा बाज़ार बेहद खतरनाक हद तक गिर गया होता, अगर इसी दौरान घरेलू निवेशक संस्थाओं (डीआईआई) ने ₹15.96 लाख करोड़ की भारी भरकम खरीद न की होती। अब तो बाज़ार से विदेशी ही नहीं, रिटेल निवेशक भी घबराकर भाग रहे हैं। जून 2026 तक निफ्टी-50 स्टॉक्स में एफपीआई का निवेश घटकर 14.5 साल के न्यूनतम स्तर 21.1% पर आ चुका है। वहीं, एनएसई की लिस्टेड कंपनियों में रिटेल निवेशकों का निवेश जून 2024 के 7.66% (₹33.16 लाख करोड़) से घटते-घटते मार्च 2026 तक 7.12% (₹28.97 लाख करोड़) पर पहुंच गया। अब मंगलवार की दृष्टि…
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