गणपति विसर्जन हो चुका है। श्राद्ध पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या अगले हफ्ते बुधवार 6 अक्टूबर को है। इसके बाद भारत के बहुलांश रिटेल व एचएनआई निवेशक त्योहारी सीजन के मूड में आ जाएंगे। यह सिलसिला दशहरा, दीवाली से होते-होते अगले साल पतंग उड़ाने के त्योहार मकर संक्रांति तक चलता रहेगा। बाज़ार में इस दौरान अगले साल मार्च तक होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के कालेधन की भी आवक शुरू हो चुकी होगी। साफ है किऔरऔर भी

हर तरफ हल्ला है कि शेयर बाजार में चल रही तेज़ी रिटेल निवेशकों की सीधी सक्रियता का नतीज़ा है। लेकिन यह दरअसल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के साथ ही देशी निवेशक संस्थाओं की तरफ से बाज़ार में ज्यादा धन डालने का नतीज़ा है। एफपीआई/एफआईआई ने इस साल अब तक भारतीय शेयर बाज़ार में शुद्ध रूप से 64,655 करोड़ रुपए डाले हैं। म्यूचुअल फंडों ने भी सितंबर तिमाही में अपना एनएवी बढ़ाने के लिए जमकर निवेश किया। वैसे,औरऔर भी

शेयर बाज़ार में जो भी ट्रेडर बाज़ार को प्रभावित करनेवाले कारकों पर नज़र और उनकी समझ रखता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौट सकता। उसे इस सत्य पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि ऐसा-ऐसा है तो वैसा-वैसा होगा और ऐसा-ऐसा नहीं है तो वैसा-वैसा नहीं होगा। यह देश-दुनिया, समाज व बाज़ार का अकाट्य नियम है। यह भी ध्यान रहे कि बाज़ार को कोई आसमानी या अदृश्य शक्तियां नहीं चलातीं। जो करते हैं इंसान ही करतेऔरऔर भी

दुनिया में कुछ भी अकारण नहीं होता। खासकर वित्तीय बाज़ारों के लिए तो यह खरा-खरा सच है। बाहर हालात को प्रभावित करनेवाले कारण देखने में काफी मुश्किल आ सकती है। लेकिन वित्तीय बाज़ार में कारक गिनती के होते हैं। कोई देखने पर उतर आए तो उन्हें साफ-साफ देख सकता है। हालांकि बावजूद इसके अनिश्चितता का तत्व या कारक वित्तीय बाज़ारों का जरूरी हिस्सा है जिससे कोई बच नहीं सकता। मगर, इसे नाथने के लिए प्रायिकता (Probability) सेऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में सक्रिय ज्यादातर लोगों की मानसिकता अब भी सट्टेबाज़ी की है। वे दिमाग से नहीं, किस्मत से खेलते हैं और बेहद लालच व भय की भावनाओं में झूलते रहते हैं तो तमाम शेयरों के भाव अतियों पर घूमते हैं। कभी बहुत ज्यादा तो कभी बहुत कम। ट्रेडिंग में तो कम पर खरीदो, ज्यादा पर बेचो का तरीका चलता ही है। लम्बे निवेश में भी हमें यह रणनीति अपनानी चाहिए। बाज़ार का जैसा स्वभाव है,औरऔर भी