जी-20 का शिखर सम्मेलन नजदीक आने के साथ ही शब्दों का खोखलापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर पर चढ़कर बोलने लगा है। एक तरफ वे जीडीपी के दम पर कहते नहीं थकते कि भारत एक दशक से भी कम समय में दसवीं से छलाग लगाकर दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। दूसरी तरफ उनका बयान है कि दुनिया का जीडीपी केंद्रित दृष्टिकोण अब मानव-केंद्रित में बदल रहा है। अगर ऐसा है तो वे एक बार भीऔरऔर भी

दुनिया के 19 देशों और यूरोपीय संघ के समूह जी-20 का गठन सितंबर 1999 में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व वित्तीय मुद्दों पर वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैकों के गर्वनरों की चर्चा के लिए किया गया था। तभी से हर साल इस समूह की रूटीन बैठक होती रही है। साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सालाना बैठक में राष्ट्र प्रमुखों को शामिल किया जाने लगा। भारत इससे पहले साल 2003 में जी-20 की अध्यक्षता कर चुका है।औरऔर भी

यह हफ्ता जी-20 के नाम। इस सप्ताहांत शनिवार-रविवार को दुनिया की तकरीबन दो-तिहाई आबादी, 75% वैश्विक व्यापार और 85% वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करनेवाले शीर्ष नीति-नियामक राजधानी दिल्ली में जमा हो रहे हैं और साझा सरोकारों पर समाधान निकालने की कोशिश करेंगे। जी-20 में यूरोपीय संघ और दुनिया के 19 अन्य देश शामिल है। ये देश हैं अमेरिका, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, ब्रिटेन, भारत, कनाडा, चीन, जर्मनी, फ्रांस, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिणऔरऔर भी

आंकड़े गवाह हैं कि पिछले सात साल में सड़क पर आ गए नौजवानों की संख्या लगातार बढ़ती गई है। इसी का एक हिस्सा दंगाई या उन्मादी भीड़ बन जा रहा है। ऊपर से कोई राजनीतिक संगठन इन्हें दिन के 200-250 से लेकर 500 रुपए दे दे तो करैला नीम चढ़ा की स्थिति बन जाती है। लेकिन यह देश के आर्थिक विकास के लिए बेहद घातक स्थिति है। यह हमारी युवा शक्ति को, हमारी डेमोग्राफी की ताकत कोऔरऔर भी

यह बेहद खतरनाक ट्रेंड है कि देश में रोजगार-प्राप्त लोगों में नौजवानों का हिस्सा घट रहा है और 60 साल के करीब पहुंच रहे लोगों का हिस्सा बढ़ रहा है। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक देश में वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 15 से 29 साल तक की 35.49 करोड़ की आबादी में से 10.34 करोड़ या करीब 29% को रोज़गार मिला हुआ था। 2022-23 में ऐसे युवाओं की आबादी 38.13 करोड़ हो गई, जिसमें से 7.10औरऔर भी

एक तरफ प्रधानमंत्री देश के नौजवान बेटी-बेटियों के सौभाग्य की बात कर रहें हैं, दूसरी तरफ दुर्भाग्य की बात यह है कि पिछले सात सालों में देश की श्रम-शक्ति तेज़ी से बूढ़ी होती जा रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों की थाह लेने पर पता चलता है कि वित्त वर्ष 2016-17 के शुरू से 2022-23 के अंत तक देश की काम-धंधे में लगी आबादी में 15 से 29 साल तक के युवाओं काऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से बोले, “आज मेरे देश के नौजवानों को, मेरे देश की बेटे-बेटियों को जो सौभाग्‍य मिला है, ऐसा सौभाग्‍य शायद ही किसी को नसीब होता है। इसलिए हमें इसे गंवाना नहीं है। युवा शक्ति में मेरा भरोसा है, युवा शक्ति में सामर्थ्‍य है और हमारी नीतियां और हमारी रीतियां भी उस युवा सामर्थ्‍य को और बल देने के लिए हैं।” क्या सचमुच ऐसा है? सरकार की जो नीतियांऔरऔर भी

शेयरों के भाव तब बढ़ते हैं जब उनके पीछे धन उमड़ता है। धन तब उमड़ता है, जब हवा होती है, माहौल बनता है। माहौल तब बनता है, जब कंपनियों के धंधे में बरक्कत हो रही होती है या ऐसा होने की प्रबल संभावना होती है। कंपनियां के धंधे में बरक्कत अर्थव्यवस्था के दम पर होती है। अर्थव्यवस्था तब बढ़ती है जब कोई देश अपनी प्राकृतिक, भौतिक व मानव सम्पदा का महत्तम इस्तेमाल करता है। भारत के पासऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कहा है कि भारत को विकसित बनाने के लिए विकास का जाप करने और अब तक चला रहा रवैया जारी रखने से काम नहीं चलेगा। अभी जैसा ढर्रा रहा तो लक्षित समय में देश को विकसित देश बनाने के लिए जो विकास दर हमें हासिल करनी है, उससे हम काफी पीछे रह जाएंगे। यह लक्ष्य पाने के लिए नितांत आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाया जाए, लॉजिस्टिक्स की लागतऔरऔर भी

जिन देशों ने उच्च-आय या विकसित देश तक का सफर तय किया है, उन्होंने दो खास काम किए। एक, छोटे से लेकर बड़े उद्योग-धंधों को बढ़ाने का सचेत फैसला और दो, विदेश व्यापार को खास तवज्जो। ये दोनों ही काम भारत की विकासयात्रा की मूल चुनौती बने हुए हैं। वैसे तो वैश्विक सुस्ती को देखते हुए विदेश व्यापार बढ़ाना काफी मुश्किल काम हो गया है। लेकिन जितना भी बढ़े, उसके लिए मैन्यूफैक्चरिंग को चमकाना ज़रूरी है। अभीऔरऔर भी