यह भारत देश है, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश। यहां बात लाखों में नहीं, करोड़ों में होती है। यहां करोड़ों किसान खेती-बाड़ी से फसल उगा रहे हैं। करोड़ों मजदूर व कर्मचारी अटक से कटक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक खेत-खलिहानों, फैक्ट्रियों, होटलों व ऑफिसों में मेहनत-मशक्कत से सरप्लस पैदा कर रहे हैं। करोड़ों छात्र-छात्राएं और युवा सुरक्षित भविष्य के लिए मगजमारी से लेकर डग्गेमारी तक कर रहे हैं। करोड़ों छोटे-छोटे उद्यम कठिन-कठोर प्रतिकूल हालात में भीऔरऔर भी

हल्ला है कि देश की अर्थव्यवस्था बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। इसका सबूत है कि लोगबाग जमकर टैक्स दे रहे हैं और सरकार भी दिल खोलकर खर्च कर रही है। पश्चिम एशिया का संकट भारत का बाल बांका भी नहीं कर सका। वित्त मंत्रालय के अधीन करनेवाले महालेखा नियंत्रक (सीजीए) ने 31 जुलाई को डेटा जारी किया कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से जून की पहली तिमाही में भारत सरकार ने 13.57 लाख करोड़औरऔर भी

देश में पहले मुद्रास्फीति की दो ही दरें हुआ करती थीं। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित थोक मुद्रास्फीति और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित रिटेल मुद्रास्फीति। अब इसमें एक तीसरी भी जुड़ गई है उत्पादकों के मूल्य सूचकांक (पीपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति। लेकिन ये सभी बैंकिंग, कॉरपोरेट क्षेत्र और वित्तीय तंत्र के लिए मायने रखती हैं, जबकि देश के आमजन के लिए इनका कोई खास मतलब नहीं। उसके लिए तो सालों-साल से ‘महंगाई डायन खायेऔरऔर भी

देश की मौद्रिक संस्था भारतीय रिजर्व बैंक कहने को अब भी स्वायत्त है। हालांकि मोदी सरकार ने पिछले बारह सालों में उसका ऐसा बधियाकरण किया है कि सरकार की हां में हां मिलाना उसकी फितरत बन गई है। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखना, आर्थिक विकास को सुगम बनाना और इसके अनुरूप नीतियां बनाना उसकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन सरकार को खुश रखने के चक्कर में वो इतना असंगत हो गया है कि उसका रुख, अनुमान और फैसला एक दिशाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार कभी झूठ नहीं बोलता। कुछ समय के लिए उसे सायास नचाया जा सकता है। लेकिन लंबे समय के लिए नहीं। फिर यह विसंगति या विरोधाभास कैसे कि जब हमारा जीडीपी इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है तो शेयर बाज़ार गिरा ही जा रहा है? क्या सरकार का जीडीपी झूठ बोल रहा है? आईएमएफ तक यह कह चुका है। उसके दबाव में भारत सरकार को जीडीपी से लेकर मुद्रास्फीति और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तक को नापनेऔरऔर भी

साल भर से ज्यादा हो गए। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग के हुनर, सीख व अभ्यास के जुड़े इस कॉलम में सबके लिए खुला लगभग 200 शब्दों का पहला पैराग्राम हमेशा अर्थव्यवस्था पर केंद्रित रहता है। कभी सरकार की नीतियां, कभी रिजर्व बैंक के फैसले तो कभी किसानी, बेरोज़गारी व गरीबी की स्थिति। अर्थव्यवस्था के पूरे स्पेक्ट्रम को पकड़ने की कोशिश रहती है। सब्सक्राइबरों के साथ ही अन्य लोगों ने भी सवाल उठाए हैं कि शेयर बाज़ार कीऔरऔर भी

देश के कम से कम 12.1 करोड़ युवा निठल्ले बैठे हैं। 81.35 करोड़ लोग हर महीने सरकार से मिलनेवाले पांच किलो मुफ्त राशन के मोहताज़ हैं। 9.45 करोड़ स्वाभिमानी किसानों की कमर ऐसी टूटी है कि सरकार से साल भर में 6000 रुपल्ली की सम्मान-निधि पाकर लाभार्थी बन गए। वित्त मंत्री सीतारमण विदेश जाकर भारतीय मध्यवर्ग को बेच रही हैं। कुछ दिन पहले फ्रांस में उन्होंने बताया कि भारतीय मध्यवर्ग 1995 से औसतन हर साल 6.3% बढ़औरऔर भी

देश में इस वक्त 12.1 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं और न ही किसी रोज़गार या ट्रेनिंग में लगे हैं। 2012 से 2024 तक युवा बेरोजगारों की संख्या तीन गुनी हो गई। जो आज तक दुनिया की किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में नहीं हुआ, वो भारत में हो चुका है। यहां 2020 से 2024 के बीच उद्योग-धधों से निकलकर आठ करोड़ मजदूर वापस खेती-किसानी में लौट गए। भारत की यह दारुण हकीकतऔरऔर भी

मोदी सरकार एक तरफ स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन इंडिया का राग अलाप रही है, दूसरी तरफ स्थिति यह है कि देश का 30.8% औद्योगिक माल चीन से बनकर आ रहा है। वित्त मंत्रालय ने कई साल से सीमावर्ती देशों की कंपनियों पर हमारे सरकारी टेंडरों में भाग लेने पर बंदिशें लगा रखी हैं। लेकिन अचानक 24 जून को मंत्रालय ने आदेश जारी करके भारत में फैक्ट्रियां चला रही चीन की चार कंपनियों को ऐसी बंदिशों सेऔरऔर भी

इसे देश की आर्थिक आपदा कहें या अर्थव्यवस्था में बढ़ रहा असंतुलन। इसका मूल आधार है मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का ठहराव और जीडीपी में उसके योगदान का घटते जाना। विश्व बैंक के डेटा के मुताबिक 2015 में हमारे जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 16% हुआ करता था। यह 2025 तक घटकर 13% रह गया है। इसी दौरान इंडोनेशिया के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़कर 19%, मलयेशिया में 23% और वियतनाम में 24% हो गया। बता दें किऔरऔर भी