भारत विकसित देश तब तक नहीं बन सकता, जब तक वो विश्व व्यापार में अपने झंडे नहीं गाड़ देता। इस समय करीब ग्यारह साल से मोदीराज के खांसने-खंखारने के बावजूद भारत की स्थिति बड़ी दयनीय बनी हुई है। 2013-14 में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा लगभग 2.2% था, जबकि 2023-24 में बहुत खींच-खांचकर 2.6% के करीब पहुंचा है। इस अवधि में भारत की व्यापार हिस्सेदारी में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन यह वृद्धि चीन, वियतनाम औरऔरऔर भी

आज ईद-उल-फितर के मौके पर शेयर बाज़ार बंद है। ईद का यह त्योहार खुशी, एकता और सद्भाव का प्रतीक है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था व शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संदेश लेकर आता है। लेकिन बेहद दुखद है कि सत्ता में बैठी भाजपा के कारिंदों ने देश भर में जगह-जगह इस त्योहार के सद्भाव को तोड़ने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश के संभल से लेकर मेरठ तक उपद्रवियों के साथ ही प्रशासन ने भी साम्प्रदायिक माहौल में तनावऔरऔर भी

आर्थिक विकास व समृद्धि के मामले में 18वीं सदी इंग्लैंड की रही तो 19वीं सदी अमेरिका और जर्मनी की। इनकी कामयाबी के पीछे अभिनव टेक्नोलॉज़ी के साथ ही निर्यात की अहम भूमिका थी। 20वीं सदी में एशिया के पांच देशों जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर व चीन ने निर्यात की बदौलत ही अपनी अर्थव्यस्था व नागरिक समृद्धि को चमकाया है। 21वीं सदी भारत की हो सकती है, बशर्ते वो विशाल घरेलू बाज़ार के दोहन के साथ हीऔरऔर भी

आखिर भारत की लक्षित ऊंची विकास दर का विकास-पथ क्या है या होना चाहिए? बराबर लम्तड़ानी करनेवाली मोदी सरकार से इसके ठोस व कारगर जवाब की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए क्योंकि उसके पास न तो भारत को विकसित बनाने की नीयत है और न ही नीतियां। वो केवल राजनीतिक सत्ता से चिपकी रहने के लिए इस नारे को जुमला बनाकर उछालती जा रही है। विकसित भारत बनाने का रास्ता वो भी नहीं है जिसकी सिफारिश विश्वऔरऔर भी

देश के आर्थिक विकास को असली खतरा उस राजनीति से है जो नारा लगाकर विकास का धंधा और झूठ बोलकर जन आकांक्षाओं की निर्मम हत्या कर रही है। चार दिन पहले भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट (X) किया कि भारत ने 2015 से 2025 के बीच जीडीपी को 2.1 ट्रिलियन डॉलर से 4.3 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंचा कर शानदार उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने आईएमएफ के नए डेटा को इसका आधार बताया। हकीकतऔरऔर भी

देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई के चेयरमैन सी.एस. शेट्टी का कहना है कि भारत को प्रगति के लिए निश्चित रूप से 8% सालाना की गति से विकास करना होगा। इसके लिए निजी पूंजी निवेश व खपत को बढ़ाना पड़ेगा। लेकिन यह कैसे होगा? वहीं, कुछ सालों में दुनिया के सबसे अमीर से सातवें नंबर पर आ चुके माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स का कहना है कि भारत अगर 2047 तक विकसित देश बन जाए तो इससेऔरऔर भी

मोदी सरकार चाहे तो भारत को 22 सालों में साल 2047 तक विकसित देश बना सकती है। लेकिन इसके लिए उसे देश के हवाई अड्डों से लेकर बंदरगाहों, खदानों और बहमूल्य रीयल एस्टेट को औने-पौने दाम पर अडाणी को बेचने से बाज आना पड़ेगा और अडाणी व अम्बानी जैसे तमाम अपने चहेते बड़े औद्योगिक समूहो को भारत का निर्यात बढ़ाने के काम में झोंक देना होगा। क्या हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के बड़े कॉरपोरेट समूहोंऔरऔर भी

आज दुनिया की जो भी व्यवस्था है, उसमें 70% देश विकसित या अमीर नहीं है। यहां अमीर देश होना नियम नहीं, अपवाद है। भारत अपने पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान व श्रीलंका के साथ निम्न मध्यम आय के 52 देशों में शुमार है, जबकि ब्राज़ील, चीन, क्यूबा, इंडोनेशिया, ईरान, इराक, लीबिया व दक्षिण अफ्रीका जैसे 54 देश उच्च मध्यम आय वाले हैं। ब्रिक्स देशों में से रूस अमीर देश है। केवल भारत निम्न मध्यम आय काऔरऔर भी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों में पले-पढ़े नरेंद्र मोदी जैसे प्रचारक भले ही सत्यमेव जयते के राष्ट्रीय आदर्श वाले देश भारत के प्रधानमंत्री बन जाएं, लेकिन वे झूठ बोलने और लम्बी फेंकने से बाज नहीं आते। मोदी कितना भी कहते रहें कि भारत को 22 साल में निम्न मध्यम आय के स्तर से उठाकर 2047 तक विकसित देश बना देंगे, मगर इतिहास साक्षी है कि पिछले 80 साल में दुनिया का कोई भी देश अपने स्तर कोऔरऔर भी

भारत साल 2007 में ही 1022 डॉलर प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न मध्यम आय का देश बन गया था। 18 साल बाद 2025 में भी वो 2698 डॉलर प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न मध्यम आय का ही देश है। अमर्त्य सेन जैसे कुछ प्रखर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर कोई देश 28 साल तक निम्न मध्यम आय की श्रेणी में फंसा रह जाता है तो इस ट्रैप से उसका निकल पाना असंभव नहीं तोऔरऔर भी