हर कोई अपने में मशगूल है। अपनी भौतिक व मानसिक जरूरतों का सरंजाम जुटा रहा है। आप इसमें मदद कर सकें तो जरूर सुनेगा आपकी। लेकिन खुद नहीं। उसे बताना पड़ेगा कि आप उसके लिए क्या लेकर आए हैं।और भीऔर भी

जैसे ही कोई द्वंद्व सुलझता है, खुशी के नए सोते खुल जाते हैं। प्रकृति का यही नियम है। टकराव को, गुत्थी को नहीं सुलझा पाना ही हार जाना है। और, हारा हुआ शख्स कभी खुश नहीं रहता। खुशी तो जीतने से ही मिलती है।और भीऔर भी

इतने सारे लोग, इतनी सारी शक्तियां और उनके बीच के इतने सारे संबंध। इन्हीं के प्रभाव से चलता है वर्तमान और भविष्य। हम जटिलता के इस सघन जाल को भेद नहीं पाते तो उसे किस्मत या संयोग कह देते हैं।और भीऔर भी

हम सभी मूलतः साधु स्वभाव के हैं। औरों की बातों से अपने काम का ‘सार’ ही ग्रहण करते हैं। लेकिन आलोचना को बिना विचलित हुए सुनना और गुनना जरूरी है क्योंकि अक्सर उनसे नई दृष्टि मिल जाती है।और भीऔर भी

सब कुछ देखने के तरीके पर निर्भर करता है। चाहो तो सारी दुनिया दोस्तों से भरी नजर आएगी। पेड़-पालव तक मदद के लिए हाथ बढ़ाते दिखेंगे। और, चाहो तो घर का आदमी भी बैरी दिखेगा। इसमें से चुनना आपको ही है।और भीऔर भी

तन है, मन है और आत्मा भी है। पदार्थ और चेतना के अलग-अलग स्वरूप हैं। आपस में ऐसे जुड़े हैं कि अलग हो ही नहीं सकते। एक के खत्म होने पर दूसरा खल्लास। इसलिए इन तीनों को स्वस्थ रखना जरूरी है।और भीऔर भी

जब तक कोई विचार हमारे अंदर उमड़ता-घुमड़ता रहता है, तब तक हम या तो उस पर लट्टू रहते हैं या दो कौड़ी का समझते हैं। विचार की असली ताकत तो उसे सामाजिक आयाम मिलने पर ही सामने आती है।और भीऔर भी

कल किसने देखा है? लेकिन अगर हम अतीत को जान लें। वहां से वर्तमान तक के सफर का ग्राफ समझ लें तो कल का खाका बनने लगता हैं। भविष्य की अनिश्चितता का जोखिम पकड़ में आने लगता है।और भीऔर भी

समुद्र में कहीं से पानी उठाओ, वह खारा ही निकलेगा। उसमें एक ही तरह के खनिज मिलेंगे। इसी तरह समाज के हर तबके में अच्छे-बुरे, दुष्ट-सज्जन लोग मिलते हैं। ऊंची डिग्रियों से किसी का मूल स्वभाव नहीं बदलता।और भीऔर भी

हम इतने बड़े भी नहीं कि खुदा हो जाएं और इतने छोटे भी नहीं कि कोई भुनगे की तरह मसल दे। हम सब निमित्त हैं। पर जो काम हमें करना है, उसे हमें ही करना होगा। नहीं तो नया निमित्त मिलने में देर हो सकती है।और भीऔर भी