गली-मोहल्ले, गांव, कस्बों व शहरों में कहीं जाकर देख लें। आम भारतीय इतने उद्यमी हैं कि तिनके का सहारा पाकर भी जीने का सलीका खोज लेते हैं। लेकिन बेहतर काम-धंधे व कमाई के लिए उन्हें बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य व कौशल चाहिए। ऐसा कौशल, जो उद्योगों से लेकर सेवा क्षेत्र तक में तेज़ी से इस्तेमाल हो रही मशीनों को चलाना सिखा सके। उद्योग धंधों के लिए यकीनन इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स की व्यववस्था चौकस होनी चाहिए। लेकिन जब शिक्षाऔरऔर भी

देश में श्रम की भरमार है। हमारी 67.3% आबादी की उम्र 15 से 59 साल है, जबकि 26% आबादी 14 साल तक की है। हमारे यहां 7% से भी कम लोग 60 साल के ऊपर के हैं, जबकि अमेरिका में ऐसी आबादी 17%, यूरोप में 21% और जापान में 32% है। छह साल बाद 2030 में भारत में कामकाजी उम्र वालों की आबादी 68.9% होगी। तब 28.4 साल की मीडियन उम्र के साथ भारत दुनिया का सबसेऔरऔर भी

कोई भी सरकार अगर सचमुच चाहती है कि देश की अर्थव्यवस्था बढ़े तो उसे धन को पूंजी में बदलने का काम करना चाहिए। लेकिन हमारी सरकार तो आर्थिक विकास के नाम पर दस साल से इवेंट और हेडलाइंस मैनेजमेंट में ही लगी है। वो अर्थव्यवस्था को भी राजनीति की तरह मैनेज करती है। जिस तरह उसने 81.35 करोड़ गरीबों को हर महीने पांच किलो मुफ्त अनाज और तमाम राज्यों की करोड़ों महिलाओं को लाडकी बहिन या लाडलीऔरऔर भी

पूंजी अगर श्रम को नियोजित न करे तो वह महज उपभोग का धन बनकर रह जाती है। मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी की शादी में जो ₹5000 करोड़ खर्च हुए, वो अगर पूंजी के रूप में निवेश किए जाते तो समाज व अर्थव्यवस्था में मूल्य जोड़ते। लेकिन वो पूंजी महज भोग-विलास और दिखावे में स्वाहा हो गई। उस दौरान एकाध हज़ार लोगों को चार-पांच दिन का काम मिला होगा, लेकिन रोज़गार नहीं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमणऔरऔर भी