संकटकाल में निवेश करें किस कंपनी में
अर्थव्यवस्था की हालत डांवाडोल हो, सरकार के दावों पर यकीन न रह गया हो, विदेशी निवेशक भागे जा रहे हों, तमाम कंपनियों का धंधा मंदा चल रहा हो, शेयर बाज़ार गिरा जा रहा हो, तब ऐसा क्या पैमाना है जिसे निवेश लायक कंपनियां छांटने का आधार बनाया जा सकता है? यह है नियोजित पूंजी पर रिटर्न या RoCE, जिसे कंपनी के ब्याज व टैक्स से पहले के लाभ (EBIT) को नियोजित पूंजी से भाग देकर निकाला जाताऔरऔर भी
खतरे रिजर्व बैंक की स्वायत्तता टूटने के!
सरकार देश की सबसे बड़ी कर्जदार है और उसके कर्ज के इंतजाम का सारा ज़िम्मा रिजर्व बैंक का है। यह भारत सरकार और रिजर्व बैंक के बीच हितों का सबसे बड़ा टकराव है। इसे दूर करने के लिए तब के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2015-16 के बजट में सरकार के ऋण प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र पब्लिक डेट मैनेजमेंट एजेंसी (पीडीएमए) बनाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन अप्रैल 2023 तक आते-आते पीडीएमए की यहऔरऔर भी
चाहे कर्जखोर सरकार घटता जाए ब्याज़!
हम प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और अन्य मंत्रियों के चेहरों पर जो चमक और आवाज़ में जो खनक देखते हैं, उसके पीछे हमारे टैक्स से ज्यादा उस ऋण का पोषण है जो हमारी संप्रभुता के दम पर लिया जाता है। जैसे, चालू वित्त वर्ष 2024-45 का बजट ₹48,20,512 करोड़ का है। इसका 33.5% या ₹16,13,312 करोड़ सरकार कर्ज से जुटा रही है। देश के खासो-आम से जुटाए गए ₹25,83,499 करोड़ के टैक्स के प्रति जवाबदेही बनती है। लेकिन सरकारऔरऔर भी
दास तो गए, आरबीआई की दासता नहीं
वित्त सचिव से रिजर्व बैंक के गवर्नर बने शक्तिकांत दास ने छह साल तक मोदी सरकार के दास की तरह काम किया। 12 दिसंबर 2018 को उनके गवर्नर बनने के बाद से 31 मार्च 20124 तक सरकार रिजर्व बैंक के खजाने से ₹6.61 लाख करोड़ साफ कर चुकी है। दास से पहले गवर्नर रहे उर्जित पटेल ने जब इसका विरोध किया था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें खजाने पर कुंडली मारकर बैठा नाग तक कह दियाऔरऔर भी






