अमेरिका द्वारा भारत से होनेवाले आयात पर जवाबी शुल्क लगा देना कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा अहम हमला है। लेकिन जिस दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जवाबी शुल्क का ऐलान कर रहे थे, उसी दिन देश की संसद को वक्फ संशोधन बिल पर उलझा देने से जगजाहिर हो गया है कि भाजपा और मोदी सरकार के लिए राष्ट्रहित की अहमियत ज्यादा है या राजनीतिक स्वार्थ की? इस सरकार ने पहले तो बजट में अमेरिकी माल वऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को देश का प्रधानसेवक बताने से नहीं थकते। लेकिन मोदी सरकार किसकी मालिक और किसकी गुलाम हैं, इसे समझने के लिए केवल एक उदाहरण काफी है। बजट से पहले आम से लेकर खास तक, सभी लोग मांग कर रहे थे कि बीमा प्रीमियम पर लिया जा रहा 18% जीएसटी खत्म या कम कर दिया जाए। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। वहीं, केंद्र सरकार 2016 से हीऔरऔर भी

यूं तो अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भारत को कोई खास अहमियत नहीं है। उसके कुल व्यापार में भारत का हिस्सा 2% से भी कम है। लेकिन वो भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझीदार देश है। वित्त वर्ष 2024-25 में दिसंबर 2024 तक के नौ महीनों में भारत का कुल व्यापार 868.60 अरब डॉलर रहा है, जिसमें से अमेरिका का हिस्सा 95.02 अरब डॉलर या 10.94% था। यही नहीं, इस अवधि में अमेरिका के साथ भारतऔरऔर भी

भारत विकसित देश तब तक नहीं बन सकता, जब तक वो विश्व व्यापार में अपने झंडे नहीं गाड़ देता। इस समय करीब ग्यारह साल से मोदीराज के खांसने-खंखारने के बावजूद भारत की स्थिति बड़ी दयनीय बनी हुई है। 2013-14 में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा लगभग 2.2% था, जबकि 2023-24 में बहुत खींच-खांचकर 2.6% के करीब पहुंचा है। इस अवधि में भारत की व्यापार हिस्सेदारी में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन यह वृद्धि चीन, वियतनाम औरऔरऔर भी

आज ईद-उल-फितर के मौके पर शेयर बाज़ार बंद है। ईद का यह त्योहार खुशी, एकता और सद्भाव का प्रतीक है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था व शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संदेश लेकर आता है। लेकिन बेहद दुखद है कि सत्ता में बैठी भाजपा के कारिंदों ने देश भर में जगह-जगह इस त्योहार के सद्भाव को तोड़ने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश के संभल से लेकर मेरठ तक उपद्रवियों के साथ ही प्रशासन ने भी साम्प्रदायिक माहौल में तनावऔरऔर भी