अक्टूबर-नवंबर में जब अपना शेयर बाज़ार कुलांचे भर रहा था, तब डेरिवेटिव सेगमेंट में मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL) 32-34% चल रही थी। दिसंबर में यह घटकर 28-29% पर आ गई और अभी 17-18% पर है। जाहिर है कि इस वक्त ट्रेडरों में रिस्क लेने का दम नहीं दिख रहा। अब इस लिमिट से जुड़े दो सैद्धांतिक सवाल। क्या समूचे बाज़ार की MWPL बढ़ते-बढ़ते 100% तक पहुंच सकती है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि 3-4% पहलेऔरऔर भी

मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL) कहां तक पहुंच जाए तो माना जा सकता है कि शेयर बाज़ार अब तलहटी पकड़ चुका है और अब तेज़ी का रुख वापस आ रहा है? जानकार बताते हैं कि यह सीमा कम से कम 30-32% तक पहुंच जाए और कुछ दिनों तक बराबर इसके आसपास या इससे ऊपर बनी रहे, तब माना जा सकता है कि तेज़ी का सूरज अब उगने जा रहा है। अभी तो स्थिति यह है कि बीतेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के रुख को भांपनेवाला तीसरा अहम संकेतक है मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL)। इसका भी वास्ता डेरिविटिव्स सेगमेंट से है। इसका डेटा हर दिन एनएसई की वेबसाइट पर डेली मार्केट रिपोर्ट्स के डेरिवेटिव्स वाले हिस्से में मिलता है। इससे पता चलता है कि सेबी और एनएसई ने जितने डेरिवेटिव एक्सपोज़र की इजाज़त दे रखी है, उसमें से बाज़ार ने कितना इस्तेमाल किया है। मान लीजिए कि किसी स्टॉक के फ्यूचर्स व ऑप्शंस में एक करोड़औरऔर भी

शेयर बाज़ार की अभी जो स्थिति चल रही है, उससे कभी-कभी तो दिन की ट्रेडिंग के दौरान निफ्टी का बेसिस ऋणात्मक हो जाता है। मतलब तब निफ्टी फ्यूचर्स का भाव निफ्टी के कैश बाज़ार के भाव से कम या डिस्काउंट पर रहता है। इस तरह शेयर बाज़ार में निराशा की भंवर से निकल कर तेज़ी की राह दिखानेवाला ‘बेसिस’ नाम का दूसरा संकेतक फिलहाल निराश कर रहा है। मंदड़ियों में शॉर्ट करने का जबरदस्त माद्दा है औरऔरऔर भी

कुछ महीने पहले जब अपने शेयर बाज़ार पर तेज़ी का सुरूर छाया था, तब अक्टूबर, नवंबर व दिसंबर में बैंक निफ्टी व निफ्टी से लेकर स्टॉक्स तक के फ्यूचर्स व कैश सेगमेंट के भाव में काफी अंतर था। उस दौरान फ्यूचर्स का प्रीमियम या बेसिस काफी ज्यादा हुआ करता था। लेकिन आज यह बेसिस बहुत मामूली रह गया। अमूमन होता यह है कि डेरिवेटिव चक्र या महीने की शुरुआत में फ्यूचर्स का प्रीमियम बहुत ज्यादा होना चाहिएऔरऔर भी