जटिलता कॉल मनी, रेपो-रिवर्स रेपो की!
वित्तीय बाज़ार में धन का केंद्रीय स्रोत हैं बैंक और बैंकों से हर पल का रिश्ता होता है केंद्रीय बैंक का। अमेरिका में यह केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व है तो अपने यहां भारतीय रिजर्व बैंक। रिजर्व बैंक रेपो और रिवर्स रेपो दर पर बैंकों से लेन-देन करता है। इसके लिए वह एसडीएफ (स्टैंडिंग डिपजिट फैसिलिटी) और एलएएफ (लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी) जैसी सुविधाएं देता है। इनके बीच कसे तारों से बनता है कॉल मनी मार्केट और तय होतीऔरऔर भी
सिद्धांत की बात है, व्यवहार में बेअसर
रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक हमारे बैंकों को एकाध दिन के लिए धन उपलब्ध कराता है, जबकि रिवर्स रेपो वह ब्याज दर है जो रिजर्व बैंक अपने पास बैंकों द्वारा रखे गए अतिरिक्त धन पर अदा करता है। जब सिस्टम में नकदी का प्रवाह ज्यादा रहता है तो रिजर्व बैंक ब्याज दर बढ़ाकर उसे घटाता है और जब कम रहता है तो ब्याज दर घटाकर उसे बढ़ाता है। माना जाता है किऔरऔर भी
धन भी हुआ महंगा, क्या रुकेगी महंगाई?
इस समय दुनिया भर के शेयर बाज़ारों के लिए मुद्रास्फीति या महंगाई सबसे विकट समस्या बनी हुई है। अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, भारत व मेक्सिको जैसे 11 प्रमुख देशों में मुद्रास्फीति की दर 6% से ज्यादा चल रही है। इससे निपटने के लिए तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ रही हैं। अपने रिजर्व बैंक ने तो दो महीने के भीतर दो बार ब्याज दर बढ़ा दी। पहलीऔरऔर भी
बड़े मिले सस्ते में, छोटों का मोह क्यों!
जब अच्छी-खासी बड़ी और सफल बिजनेस कर रही कंपनियों के शेयर सस्ते में मिल रहे हों, तब छोटी व अनिश्चित भविष्य वाली कंपनियों की तरफ क्यों झांकना? इस समय अपना शेयर बाज़ार हमें तमाम अवसर दे रहा है। लेकिन केवल कंपनी ही नहीं, बल्कि यह भी देखें कि वह जो बिजनेस कर रही है, उसका अतीत, वर्तमान व भविष्य कितना मजबूत है। दुनिया के सफलतम निवेशक वॉरेन बफेट का फॉर्मूला यही है कि स्टॉक्स या कंपनियां नहीं,औरऔर भी







