रिस्क से जुड़ा निराशावाद या आशावाद!

रिस्क बहुत ज्यादा हो तो इंसान को निराशावादी हो जाना चाहिए और रिस्क काफी कम हो तो आशावादी। जबरदस्त रिस्क के माहौल में आशावाद हमारी नैया डुबा सकता है, जबकि निराशावाद से घिरे होने के कारण हम बहुत-बहुत फूंक-फूंककर सावधानी से चलेंगे तो बचने की गुंजाइश भरपूर रहेगी। वहीं, रिस्क बहुत कम हो तो आशावाद से लबालब होकर हम सुरक्षित फैसले ले सकते हैं, जबकि निराशावाद में डूबने पर अच्छे-खासे सुरक्षित मौके भी हमारे हाथ से निकल जाएंगे। चूंकि निवेश अभी नहीं, भविष्य में फल देता तो वह रिस्की उद्यम है। सरकारी बांडों में न्यूनतम रिस्क तो उसमें आशावाद बरतें और शेयर बाज़ार में अधिकतम रिस्क तो इसमें बेहद सावधानी बरतते हुए ही लम्बे निवेश या ट्रेडिंग का फैसला करें। अब तथास्तु में आज की कंपनी…

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