सभी कंपनियों का धंधा एक जैसा नहीं चमकता तो उनके शेयरों की चाल एक जैसी कैसे हो सकती है? इसीलिए शेयर बाज़ार में समझदार निवेशक एक नहीं, अनेक कंपनियों में धन लगाते हैं। निवेश की गई कंपनियों के इसी सेट को पोर्टफोलियो कहते हैं। सवाल उठता है कि पोर्टफोलियो में कितनी कंपनियों के शेयर होने चाहिए ताकि उनका अलग-अलग रिस्क आपस में कटकर पूरे बाज़ार के समतुल्य या बराबर हो जाए? जानकार मानते हैं कि आदर्श पोर्टफोलियोऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग का रिस्क दिन तक ही सीमित रखनेवाले इंट्रा-डे ट्रेडरों के रुझान का पता लगाने का संकेतक है एडवांस-डिक्लाइन अनुपात। दूसरी तरह के ट्रेडर वे हैं जो ज्यादा रिस्क लेते हैं, जिनके पास ज्यादा धन है। वे मार्क टू मार्जिन चुकाकर अपने सौदे कई दिन तक आगे बढ़ा सकते हैं। अक्सर वे डेरिवेटिव सेगमेंट में शामिल स्टॉक्स और निफ्टी व बैंक निफ्टी में ट्रेड करते हैं। इनकी सक्रियता बाज़ार की भावी चाल के दूसरेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा उछल-कूद और धमाचौकड़ी मचाते हैं इंट्रा-डे ट्रेडर। ऐसे ट्रेडर जो खरीद या बिक्री (लॉन्ग या शॉर्ट) की पोजिशन अगले दिन तक नहीं ले जाते। इन्हीं की सक्रियता से बनता है दिन का एडवांस-डिक्लाइन अनुपात, किसी दिन कितने शेयर बढ़े और कितने घटे, इसका अनुपात। अगर यह एक से ज्यादा है तो बाज़ार में खरीद या तेजड़ियों का दम ज्यादा है और एक से कम है तो बिकवाली या मंदडियों का ज़ोर अधिकऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक बेचे ही जा रहे हैं। फिर भी कुछ दिन से बाज़ार बढ़ रहा है। लेकिन निफ्टी-50 अब भी अपने शिखर से 10% से ज्यादा नीचे है। सबसे दिमाग में यही सवाल नाच रहा है कि आखिर बाज़ार की तलहटी क्या होगी, जहां से वह पलटकर उठने लगेगा? जब हो जाएगा, तब इसका पता चलेगा। अभी तो इसका सटीक जवाब किसी के भी पास नहीं है। जो है वो केवल कयासबाज़ी है। फिर भी इंसानऔरऔर भी

मुद्रास्फीति से लड़ने में हमारा रिजर्व बैंक तारे गिनता नज़र आ रहा है। उसके ब्याज दर बढ़ाने के बावजूद मुद्रास्फीति थम नहीं रही। अप्रैल में रिटेल मुद्रास्फीति आठ साल के शिखर 7.79% और थोक मुद्रास्फीति 15.08% रही है जो 2011-12 की नई सीरीज का शिखर है। रिजर्व बैंक जिस तरह ब्याज दर और सीआरआर (रिजर्व बैंक के पास बैंकों द्वारा रखे जानेवाली जमा का हिस्सा) बढ़ाकर सिस्टम में धन का प्रवाह रोक रहा है, उसका नकारात्मक असरऔरऔर भी