अमेरिका हर तरह के आर्थिक संकट से निपटने के लिए मुफ्त में नोट छापकर सिस्टम में डालता रहा। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद उसने ऐसा किया। फिर यही काम कोरोना महामारी के दौरान किया। अमेरिका में जितने डॉलर है, उसका लगभग 20% हिस्सा केवल साल 2020 में छापा गया। अमेरिका व अन्य विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों को करना यह चाहिए था कि सिस्टम में डाले गए अतिरिक्त नोट संकट हल्का होते ही वापस खींचतेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की हालत डांवाडोल है। फिर भी बहुतेरे विश्लेषक कहते हैं कि चालू वित्त वर्ष 2022-23 के अंत में निफ्टी-50 का ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) 1000 रुपए रहेगा। निफ्टी अभी 16,352.45 पर है तो अनुमानित ईपीएस से 16.35 गुना भाव या पी/ई अऩुपात पर ट्रेड हो रहा है। लगभग इतना ही पी/ई अनुपात कोरोना संकट के शुरू में था, जहां से बाज़ार उछलकर ऊपर उठा था। इसलिए बाज़ार का मौजूदा स्तर जमकर खरीदने का है। लेकिनऔरऔर भी

दशकों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि मुद्रास्फीति भारत ही नहीं, अमेरिका व यूरोप समेत तमाम विकसित देशों तक के सिर चढ़कर बोल रही है। ऐसे में इन देशों के केंद्रीय बैंकों की पहली प्राथमिकता बन गई है कि सिस्टम में डाले गए नोट वापस खींचो और ब्याज दरें बढ़ा दो। लेकिन इधर खिंचते जा रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने सप्लाई में दिक्कतें पैदा कर दी और महंगाई बढ़ाने का नया आधार बना दिया। अमेरिका नेऔरऔर भी

हम शेयर बाज़ार में रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों की ताकत की बात करते रह सकते हैं। लेकिन बढ़ती मुद्रास्फीति ने उन्हें निचोड़ना शुरू कर दिया। नौकरी और काम-धंधे से होनेवाली आय ठहरी पड़ी है। खर्च बढ़ते जा रहे हैं। वह भी तब, जब अभी तक बढ़ती ब्याज दर का असर ईएमआई पर नहीं पड़ा है. सवाल उठता है कि क्या घर-गृहस्थी चलाने के बढ़े खर्च के अनुरूप आम लोगों की आमदनी भी बढ़ने जा रही है? साफऔरऔर भी