यूपीआई का हल्ला। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री की वाह-वाही थम नहीं नहीं रहे। लेकिन यूपीआई में सबसे ज्यादा धंधा पेटीएम और गूगल-पे कर रहे हैं। पेटीएम स्वामित्व के लिहाज से अब चीनी कंपनी है, जबकि गूगल-पे पूरी तरह अमेरिकी है। क्रेडिट व डेबिट कार्ड के लिए स्वदेशी रूपे को लॉन्च किए हुए 11 साल हो चुके हैं। लेकिन अब भी अधिकांश कार्ड वीसा या मास्टरकार्ड हैं जो अमेरिकी कंपनियां हैं जिनके पास भारतीय उपभोक्ताओं की खरीद सेऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था और उत्पादन के चार बुनियादी कारक हैं – ज़मीन, श्रम, पूंजी और उद्यमशीलता। उद्यमशीलता की अपने यहां कोई कमी नहीं है। अर्थव्यवस्था का अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र इसकी गवाही देता है, जहां देश का 94% से ज्यादा रोज़गार मिला हुआ है। नोटबंदी से पहले अर्थव्यवस्था में इसका योगदान 55-60% हुआ करता है जो जीएसटी जैसे कदमों से घटकर अब 15-20% रह गया है। लेकिन ज़मीन, श्रम व पूंजी की स्थिति दयनीय बनी हुई है। सब कुछऔरऔर भी

आज़ादी का अमृतकाल। आज़ादी के 76 साल पूरे। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार दसवीं बार देश को संबोधन। सरकार के पास संसद में बहुमत इतना कि जो चाहे कर सकती है। समूचे देश में वही पूरी तरह आज़ाद है। दस दिन पहले ही अचानक उसने फरमान जारी कर दिया कि देश में पीसी से लेकर लैपटॉप, पामटॉप, ऑटोमेटिक डेटा प्रोसेसिंग मशीन और माइक्रो व लार्जफ्रेम कंप्यूटर तक के आयात के लिए लाइसेंस लेनाऔरऔर भी

जो बड़ा है, वो अच्छा हो, यह कतई ज़रूरी नहीं। यह जीवन से लेकर बिजनेस तक के लिए सच है। लेकिन बिजनेस का सच यह भी है कि जो अच्छी व शानदार कंपनियां हैं, वे ज़रूरी नहीं कि बड़ी कंपनियां हों। खासकर, भारत जैसे देश की हकीकत यह है कि यहां रोज़गार से लेकर निर्यात तक में सबसे बड़ा योगदान छोटी व औसत या मध्यम आकार की कंपनियों का है। निवेश के लिहाज़ से भी छोटी कंपनियांऔरऔर भी