विकसित देश बनना इतना आसान नहीं!
तीन-चार साल में भारत का दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना तय है। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा भारत को 2047 तक विकसित देश बना देने का वादा खुद-ब-खुद नहीं पूरा होने जा रहा। ऐसा इसलिए क्योंकि इसका वास्ता जीडीपी के आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति आय से है जिसमें भारत इस समय 2256.59 डॉलर के साथ दुनिया के 190 देशों की सूची में 146वें स्थान पर है। 189वें नंबर पर अफगानिस्तान और 190वें पर बुरुंडीऔरऔर भी
अर्थव्यवस्था में झांकी व सब्ज़बाग नहीं!
शेयर बाज़ार आज के यथार्थ पर नहीं, बल्कि कल के ख्वाब पर चलता है। हालांकि ये ख्वाब भी हवा-हवाई नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत से निकले अनुमानों पर टिके होते हैं। अर्थव्यवस्था और कंपनियों की संभावित मजबूती ही अंततः शेयर बाज़ार की तेज़ी का आधार होती है। लेकिन अर्थव्यवस्था को अगर सब्ज़बाग पर चुनावी उड़ान भरने का साधन बना दिया जाए तो मामला बड़ा संगीन हो जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था को कायदे से 8-9% की सालाना दर सेऔरऔर भी
कंपनियां हों ऐसी जो चलें सदा के लिए!
क्या ऐसा हो सकता है कि बराबर कंपनियां छांटकर निवेश करने के बजाय हम एक बार ही 20-30 कंपनियों में निवेश कर दें और भूल जाएं। दस-बीस साल तक बराबर लाभांश पाते रहें और जब ज़रूरत पड़े तो 15-16% की सालाना चक्रवृद्धि दर के रिटर्न के साथ अपना धन निकालकर इस्तेमाल कर लें। लाभांश का चक्कर छोड़ दें तो हम निफ्टी-50 के ईटीएफ में एसआईपी से यह काम कर सकते हैं। साथ ही कुछ कंपनियों का दमखमऔरऔर भी
कौन आज़ाद हुआ? न पूंजी, न उद्योग!
वाणिज्य मंत्रालय से जुडे व्यापार उपचार महानिदेशालय (डीजीटीआर) ने सिफारिश की थी कि चीन से आयात हो रहे स्टील उत्पादों पर पांच सालों के लिए 18.95% काउंटरवेलिंग ड्यूटी (सीवीडी) लगा दी जाए ताकि घरेलू स्टील उद्योग को बचाया जा सके। लेकिन वित्त मंत्रालय ने इनकार कर दिया। उसका कहना है कि इससे भले ही देशी स्टील निर्माताओं को नुकसान हो, लेकिन स्टील उपभोक्ता भारतीय फर्मों को फायदा होगा। सवाल उठता है कि जब सारी दुनिया के देशऔरऔर भी






